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प्रतापगढ़ में SLWM पर मेगा खुलासा: 100 करोड़+ खर्च, बिना टेंडर खरीद के आरोप—डीपीआरओ केंद्र में:


प्रतापगढ़ जनपद में पंचायत राज विभाग के अंतर्गत चल रही SLWM (Solid & Liquid Waste Management) योजना अब बड़े विवादों के केंद्र में है।
आरोप है कि स्वच्छता के नाम पर 100 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि खर्च हुई, लेकिन ज़मीन पर काम संदिग्ध है और कई जगह टेंडर प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
इसी के साथ यह भी आरोप सामने आया है कि कंप्यूटर, फर्नीचर, डस्टबिन और कूड़ा गाड़ी जैसी बड़ी खरीद “चहेती फर्म” से कराई गई, जिससे पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
 SLWM योजना क्या है? (बेसिक समझ)
यह योजना स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) Phase-II (2020) का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य:
गांवों में कचरा प्रबंधन
नाली के पानी का ट्रीटमेंट
स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण
隣 SLWM के प्रमुख कार्य (जिन पर पैसा खर्च हुआ)
️ ठोस कचरा प्रबंधन
घर-घर कचरा संग्रहण
डस्टबिन वितरण
कचरा गाड़ी / ट्रॉली
कम्पोस्ट यूनिट
कचरा शेड (MRF)
 तरल अपशिष्ट प्रबंधन
नालियों का निर्माण
सोखता गड्ढा
तीन तालाब सिस्टम (नाली पानी ट्रीटमेंट)
 अन्य खर्च
जागरूकता अभियान (IEC)
प्रशिक्षण कार्यक्रम
संचालन और रखरखाव
 अब आरोपों की पूरी परत दर परत कहानी
❗ 1. 100 करोड़+ खर्च, लेकिन टेंडर नहीं?
आरोप:
बड़े स्तर की खरीद में ई-टेंडर प्रक्रिया नहीं अपनाई गई
सीधे फर्मों को काम दिया गया
 सवाल:
क्या नियमों को दरकिनार किया गया?
क्या खरीद को छोटे हिस्सों में बांटकर टेंडर से बचा गया?
️ 2. कंप्यूटर और फर्नीचर खरीद—“फिक्स सप्लाई” का खेल?
पंचायत भवनों के लिए:
कंप्यूटर
टेबल, कुर्सी
 आरोप:
एक ही फर्म से सप्लाई
बाजार से ज्यादा कीमत
गुणवत्ता संदिग्ध
️ 3. डस्टबिन और कूड़ा गाड़ी—सबसे बड़ा खर्च, सबसे बड़ा शक
घर-घर डस्टबिन वितरण
कूड़ा गाड़ी खरीदी
 आरोप:
डस्टबिन कम, बिल ज्यादा
गाड़ियां खरीदी गईं, लेकिन दिखती नहीं
घटिया सामान
️ 4. SLWM के असली काम—जमीन पर सवाल
 तीन तालाब सिस्टम
कई जगह:
तालाब अधूरे
या बने ही नहीं
 कम्पोस्ट यूनिट / कचरा शेड
कागजों में मौजूद
जमीन पर खाली जगह
 नालियों का कनेक्शन
नालियां बनीं, लेकिन ट्रीटमेंट सिस्टम से जुड़ी नहीं
 5. स्वच्छता प्रचार फंड—सिर्फ कागजों में?
रैली, पोस्टर, अभियान
 आरोप:
गांव में कोई गतिविधि नहीं
लेकिन पूरा बजट खर्च
 6. प्रशिक्षण कार्यक्रम—रिकॉर्ड में आयोजन?
कर्मचारियों/प्रधानों की ट्रेनिंग
 आरोप:
कागजों में कार्यक्रम
असल में आयोजन नहीं
 7. कंटिन्जेंसी फंड—कोई हिसाब नहीं?
छोटे खर्च के नाम पर पैसा निकला
 लेकिन:
कोई स्पष्ट सार्वजनिक विवरण नहीं
️ 8. क्लस्टर निर्माण—वसूली का आरोप
पंचायतों को जोड़कर क्लस्टर बनाना
 आरोप:
चयन में पारदर्शिता नहीं
फाइल आगे बढ़ाने में वसूली
 9. सबसे बड़ा सवाल: ऑडिट क्यों नहीं?
आरोप:
 2017 से अब तक फाइनेंशियल ऑडिट नहीं कराया गया
 मतलब:
खर्च की जांच नहीं
गड़बड़ी छिपी रह सकती है
⚖️ 10. डीपीआरओ की भूमिका—क्यों केंद्र में?
डीपीआरओ की जिम्मेदारी:
खरीद प्रक्रिया की निगरानी
भुगतान से पहले सत्यापन
ऑडिट सुनिश्चित करना
 ऐसे में सवाल:
क्या उन्होंने नियमों का पालन कराया?
क्या गड़बड़ियों को नजरअंदाज किया?
या फिर कोई बड़ी लापरवाही हुई?
 पूरे मामले की बड़ी तस्वीर
 एक ही पैटर्न उभरता है:
बिना टेंडर खरीद
एक फर्म को फायदा
कागजों में काम
ऑडिट नहीं
खर्च का हिसाब अस्पष्ट
 यह सामान्य गड़बड़ी नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक समस्या का संकेत है
 क्या होना चाहिए अब? (सीधी मांग)
पूरे SLWM फंड की स्वतंत्र जांच (SIT/Vigilance)
सभी खरीद की टेंडर जांच
गांव-गांव फिजिकल वेरिफिकेशन
ऑडिट तुरंत कराया जाए
दोषियों पर सख्त कार्रवाई
裡 निष्कर्ष
“स्वच्छता के नाम पर करोड़ों का खेल?”
कागजों में विकास
जमीन पर सवाल
जिम्मेदार चुप
 अब यह सिर्फ आरोप नहीं—
जांच की मांग बन चुका बड़ा मुद्दा है
 तगड़ी हेडलाइन
 “SLWM में 100 करोड़ का खेल? बिना टेंडर खरीद पर बवाल”
 “डस्टबिन से कंप्यूटर तक—एक ही फर्म पर मेहरबानी?”
 “ऑडिट गायब, खर्च बेहिसाब—प्रतापगढ़ में बड़ा सवाल”
 “स्वच्छता योजना बनी कमाई का जरिया?”

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