
गोंडा/लखनऊ। स्टार लाइट ब्रुकेम डिस्टलरी, नवाबगंज गोंडा में 27610 लीटर ईएनए के चोरी/बहाव के प्रकरण में कार्रवाई तो सहायक आबकारी आयुक्त रामप्रीत चौहान तक सीमित रही, लेकिन इस पूरे मामले में अब नए सवाल उठ खड़े हुए हैं।
सूत्रों के अनुसार, उक्त ईएनए का ऑफलाइन परमिट तत्कालीन डिप्टी एक्साइज कमिश्नर और वर्तमान में जॉइंट एक्साइज कमिश्नर मेरठ (अतिरिक्त प्रभार लखनऊ) दिलीप मणि त्रिपाठी द्वारा जारी किया गया था। सवाल यह उठ रहा है कि जब ऑफलाइन परमिट जारी करना नियमविरुद्ध था, तो इस गड़बड़ी के मुख्य जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
गौरतलब है कि इस प्रकरण की जांच वर्तमान डिप्टी एक्साइज कमिश्नर आलोक कुमार ने की थी। उनकी रिपोर्ट में दिलीप मणि त्रिपाठी की भूमिका का उल्लेख न किया जाना अब संदेह के घेरे में है। विभाग के अंदर यह चर्चा तेज है कि कहीं आलोक कुमार और दिलीप मणि त्रिपाठी के बीच किसी प्रकार की दुर्व्यवहारिक सन्धि (दुरभिसंधि) तो नहीं थी, जिसके चलते जांच रिपोर्ट से यह महत्वपूर्ण तथ्य जानबूझकर गायब कर दिया गया।
अब बड़ा सवाल यह है कि —
जब नियम विरुद्ध ऑफलाइन परमिट जारी किया गया, और जांच अधिकारी ने इस तथ्य को रिपोर्ट में छिपाया, तो आबकारी नियमावली और यूपी गवर्नमेंट सर्विस कंडक्ट रूल्स के अनुसार, इनके विरुद्ध क्या कार्रवाई होनी चाहिए?
🔹 नियम के अनुसार संभावित कार्रवाई:
- उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (आचरण) नियमावली 1956 की धारा 3 के तहत — यदि कोई अधिकारी अपने कर्तव्य के निर्वहन में ईमानदारी या निष्पक्षता से समझौता करता है, तो उसके विरुद्ध गंभीर अनियमितता (Gross Misconduct) का मामला बनता है।
- विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही नियम 1999 के तहत — ऐसे मामलों में जांच, निलंबन या पद से हटाए जाने की कार्रवाई की जा सकती है।
- वित्तीय अनियमितता पाए जाने पर, संबंधित अधिकारी से राजकोषीय क्षतिपूर्ति (Recovery) भी की जा सकती है।
इस पूरे मामले ने आबकारी विभाग की जवाबदेही और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह होगा कि विभागीय मंत्री श्री नितिन अग्रवाल इस मामले में उच्च स्तर पर क्या कार्रवाई करते हैं — क्या कार्रवाई सिर्फ निचले स्तर तक सीमित रहेगी, या फिर जिम्मेदारी शीर्ष स्तर तक तय की जाएगी?




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