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प्रतापगढ़ में  बैंक डूबी, हजारों लोगों के कई 100 करोड रुपए फ्रीज :

 अर्बन बैंक का लाइसेंस रद्द, हजारों ग्राहकों के खाते फ्रीज; करोड़ों रुपये फंसे
प्रयागराज/लखनऊ। वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोपों के चलते भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 10 अप्रैल को अर्बन कोऑपरेटिव बैंक का लाइसेंस निरस्त कर दिया। इस कार्रवाई के बाद बैंक की सभी बैंकिंग गतिविधियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई, जिससे हजारों खाताधारकों के खाते फ्रीज हो गए हैं और करोड़ों रुपये अटक गए हैं। अचानक लिए गए इस फैसले से उपभोक्ताओं में हड़कंप मच गया है और बैंक के बाहर जानकारी लेने वालों की भीड़ देखी जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक, बैंक में लंबे समय से वित्तीय गड़बड़ियों का सिलसिला चल रहा था। फर्जी लोन वितरण, संदिग्ध खातों के जरिए लेनदेन और बैलेंस शीट में हेरफेर जैसे गंभीर आरोप सामने आए हैं। बताया जा रहा है कि कई लोन ऐसे लोगों और फर्मों के नाम पर जारी किए गए, जिनकी न तो पर्याप्त जांच की गई और न ही उनकी वित्तीय क्षमता का सही आकलन किया गया। इससे बैंक की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती चली गई।
सबसे ज्यादा असर आम खाताधारकों पर पड़ा है। जिन लोगों ने अपनी जीवन भर की कमाई इस बैंक में जमा कर रखी थी, वे अब निकासी न कर पाने के कारण परेशान हैं। छोटे व्यापारी, पेंशनभोगी और मध्यम वर्गीय परिवार इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। कई लोग इलाज, बच्चों की पढ़ाई और दैनिक खर्च के लिए बैंक में जमा रकम पर निर्भर थे, जो अब अचानक ठप हो गई है।
कोऑपरेटिव बैंकों की निगरानी दोहरी व्यवस्था के तहत होती है। एक ओर RBI वित्तीय अनुशासन और बैंकिंग नियमों की निगरानी करता है, वहीं दूसरी ओर राज्य का कोऑपरेटिव विभाग प्रशासनिक नियंत्रण देखता है। इसके बावजूद इतनी बड़ी गड़बड़ियों का समय रहते सामने न आना या उन पर कार्रवाई न होना, निगरानी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
जानकारों का कहना है कि समय-समय पर होने वाले ऑडिट और निरीक्षण यदि प्रभावी तरीके से किए जाते, तो इस स्थिति से बचा जा सकता था। कई बार शुरुआती स्तर पर ही गड़बड़ियों के संकेत मिल जाते हैं, लेकिन उन पर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए जाते, जिससे मामला और गंभीर हो जाता है। इस प्रकरण में भी ऑडिट प्रक्रिया और निरीक्षण व्यवस्था की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
हालांकि, खाताधारकों को डिपॉजिट इंश्योरेंस के तहत एक निश्चित सीमा तक राहत मिलने की उम्मीद है, लेकिन जिन लोगों की जमा राशि अधिक है, उनके लिए चिंता कम नहीं हुई है। पैसा वापस मिलने की प्रक्रिया भी समय लेने वाली हो सकती है, जिससे उपभोक्ताओं की परेशानियां और बढ़ सकती हैं।
वहीं, बैंक प्रबंधन ने भारतीय रिज़र्व बैंक के इस फैसले को उच्च प्राधिकरण में चुनौती देने की घोषणा की है। प्रबंधन का कहना है कि वे इस निर्णय के खिलाफ अपील करेंगे और अपना पक्ष मजबूती से रखेंगे।
फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ बैंकिंग व्यवस्था बल्कि निगरानी तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि जांच में क्या खुलासा होता है और प्रभावित खाताधारकों को कब तक राहत मिल पाती है।

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