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आबकारी विभाग में “मनपसंद पोस्टिंग मॉडल” चल रहा है?

राकेश सिंह हटेंगे या नहीं उसको लेकर ही चर्चा क्यों हो रही है स्कूल लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।

राकेश सिंह को बचाने के लिए ट्रांसफर नीति में बदलाव की चर्चा से उठे बड़े सवाल

उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग में इन दिनों एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है — राकेश सिंह। वजह है उनकी लंबे समय से लखनऊ मंडल में बनी हुई तैनाती और अब उन्हें बचाने के लिए कथित तौर पर नियमों की नई व्याख्या किए जाने की चर्चा।

सूत्रों के मुताबिक राकेश सिंह ने मोहम्मदी तहसील और लखीमपुर जनपद में इंस्पेक्टर के रूप में लगभग 3 वर्ष सेवाएं दीं। इसके बाद वे लखनऊ में जिला आबकारी अधिकारी (DEO) के रूप में करीब ढाई वर्ष और अब डिप्टी एक्साइज कमिश्नर के रूप में लगभग एक वर्ष से तैनात बताए जा रहे हैं।

यानी कुल मिलाकर लखनऊ मंडल में उनका लंबा सेवाकाल हो चुका है। सामान्य प्रशासनिक सिद्धांतों और तबादला नीति की भावना के अनुसार इतनी लंबी अवधि के बाद अधिकारी का स्थानांतरण होना चाहिए।

लेकिन अब विभाग में यह चर्चा तेज है कि एक “बड़ी डील” के तहत उनके मामले में नियमों की ऐसी व्याख्या की जा सकती है जिससे उनका ट्रांसफर रोका जा सके।

क्या सेवाकाल को “टुकड़ों” में बांटने की तैयारी?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी अधिकारी के सेवाकाल को पद के आधार पर अलग-अलग करके देखा जा सकता है, जबकि अधिकारी लगातार एक ही मंडल में प्रभावशाली पदों पर तैनात रहा हो?

चर्चा यह है कि—

  • इंस्पेक्टर के रूप में बिताया गया समय नहीं जोड़ा जाएगा,
  • जिला आबकारी अधिकारी (DEO) के रूप में की गई सेवा भी अलग मान ली जाएगी,
  • केवल डिप्टी एक्साइज कमिश्नर के रूप में वर्तमान तैनाती को ही आधार बनाया जाएगा।

यदि ऐसा हुआ तो यह केवल एक अधिकारी को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों की सुविधानुसार व्याख्या मानी जाएगी।

तबादला नीति की मूल भावना क्या कहती है?

सरकारी तबादला नीति का उद्देश्य सिर्फ पद बदलना नहीं बल्कि प्रभाव क्षेत्र बदलना होता है।

किसी भी संवेदनशील विभाग में लंबे समय तक एक ही मंडल या जिले में तैनाती को प्रशासनिक निष्पक्षता के खिलाफ माना जाता है। आबकारी विभाग तो विशेष रूप से राजस्व, लाइसेंसिंग और प्रवर्तन से जुड़ा विभाग है, जहां लंबे समय तक जमे अधिकारियों को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं।

ऐसे में यदि सेवाकाल की गणना “पदनाम आधारित तकनीकी खेल” के जरिए बदली जाती है, तो यह नीति की आत्मा के विपरीत माना जाएगा।

“एक अधिकारी, अलग-अलग नियम?”

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि—

  • क्या यही सुविधा अन्य अधिकारियों को भी मिलेगी?
  • क्या कोई सामान्य अधिकारी भी अपने पुराने पदों का सेवाकाल हटवा सकता है?
  • क्या शासन अब पद बदलकर वर्षों तक एक ही मंडल में बने रहने का रास्ता खोलने जा रहा है?

यदि ऐसा होता है तो यह प्रशासनिक व्यवस्था में समानता और पारदर्शिता के सिद्धांत पर सीधा प्रहार माना जाएगा।

“स्वेच्छाचारिता और अराजकता” का आरोप क्यों?

प्रशासनिक जानकार मानते हैं कि यदि किसी अधिकारी को बचाने के लिए नियमों की “कस्टमाइज्ड व्याख्या” की जाती है, तो यह व्यवस्था में अराजकता का खतरनाक उदाहरण बन सकता है।

क्योंकि तब भविष्य में हर प्रभावशाली अधिकारी अपने लिए अलग नियम मांग सकता है।

ऐसी स्थिति में तबादला नीति केवल कागजी दस्तावेज बनकर रह जाएगी और विभागों में “जिसकी पहुंच, उसका नियम” वाली व्यवस्था हावी हो जाएगी।

अब शासन के सामने सबसे बड़ा सवाल

यदि राकेश सिंह के मामले में इंस्पेक्टर और DEO के रूप में लखनऊ मंडल में बिताए गए सेवाकाल को नजरअंदाज किया जाता है, तो शासन को सार्वजनिक रूप से यह बताना होगा कि—

  • इसका वैधानिक आधार क्या है?
  • कौन सा शासनादेश इसकी अनुमति देता है?
  • क्या यह नियम सभी अधिकारियों पर समान रूप से लागू होगा?

वरना यह मामला केवल एक ट्रांसफर विवाद नहीं बल्कि “प्रशासनिक निष्पक्षता बनाम प्रभावशाली संरक्षण” की बहस बन सकता है।

सभी सवाल चर्चाओं पर आधारित है अंतिम परिणाम के लिए 31 में तक इंतजार करना होगा। निष्पक्ष और पारदर्शी स्थानांतरण के लिए सब की निगाहें आबकारी विभाग के ऊपर टिकी हुई है।

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