
🚨 कोडीन किंग का काला साम्राज्य और आबकारी विभाग की संदिग्ध चुप्पी!
शुभम जायसवाल से विभागीय रिश्तों पर उठे गंभीर सवाल
लाइसेंस देने वाले शीर्ष अफसर जांच के घेरे में — लैब रिपोर्ट गायब, विभाग की साख रसातल में
अवधभूमि स्पेशल इन्वेस्टिगेशन | वाराणसी–लखनऊ
वाराणसी के बहुचर्चित कोडीन सिरप कांड ने आबकारी विभाग के पूरे ढांचे को झकझोर दिया है।
अब जांच का फोकस सीधे उस कड़ी पर आ गया है, जहां से इस धंधे की नींव रखी गई—
लाइसेंस, निरीक्षण, प्रवर्तन और विभागीय संरक्षण!
सबसे बड़ा सवाल यही—
❗ क्या शुभम जायसवाल और आबकारी विभाग के बीच कोई “सुरक्षित संबंध” था?
कारण साफ है—
जहां कार्रवाई होनी चाहिए थी, वहां चुप्पी थी…
जहां जांच होनी चाहिए थी, वहां सिर्फ काग़ज़ चले…
और जहां रिपोर्ट मिलनी चाहिए थी, वहां फाइलें गायब!
🔥 लाइसेंस का खेल: दो बड़े अफसरों पर जांच की तलवार
अवधभूमि की जांच में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी निकलकर सामने आई—
1️⃣ पूर्व अतिरिक्त आबकारी आयुक्त (लाइसेंस) – हरिश्चंद्र श्रीवास्तव
कोडीन आधारित दवा की बिक्री के लाइसेंस इन्हीं के कार्यकाल में तेजी से आगे बढ़े।
सवाल—
क्या सभी दस्तावेज़ फील्ड में सत्यापित हुए थे या फाइलों में?
2️⃣ डिप्टी एक्साइज कमिश्नर/ (तकनीक)प्राविधिक अधिकारी
निरीक्षण, सत्यापन और बैकग्राउंड चेक इनकी जिम्मेदारी थी।
अब जांच एजेंसियाँ देख रही हैं—
क्या निरीक्षण वास्तविक था या महज “कागजी औपचारिकता”?
दोनों अधिकारी अब फोकस में हैं और फाइलें खंगाली जा रही हैं।
⚠️ सबसे बड़ा विस्फोट: क्षेत्रीय आबकारी लैब की रिपोर्ट कहां है?
आबकारी विभाग का दावा था—
“हमने जांच की, नमूने लिए, कार्रवाई की…”
लेकिन सबसे अहम दस्तावेज़ ही गायब है—
❌ क्षेत्रीय आबकारी लैब की रिपोर्ट!
अगर जांच हुई थी तो—
- नमूना किसने भेजा?
- किस केस डायरी में उल्लेख है?
- रिपोर्ट कब आई?
- शासन को क्यों नहीं भेजी गई?
- और अगर रिपोर्ट आई ही नहीं—
तो शासन को “सब ठीक है” की रिपोर्ट किस आधार पर भेज दी गई?
लैब रिपोर्ट की गैर मौजूदगी इस कांड की सबसे खतरनाक परत है।
🟥 वाराणसी के जिला, रेंज और प्रवर्तन अधिकारियों की चुप्पी बेहद संदिग्ध
जहां कोडीन सिरप का अरबों का धंधा खुल रहा था,
वहीं वाराणसी में—
- प्रवर्तन इकाई सोई पड़ी
- डीईओ निरीक्षण भूल गए
- डिप्टी कमिश्नर ने तथ्यों की पुष्टि नहीं की
- रेंज से शासन तक “कुछ नहीं मिला” की फाइल भेज दी गई
यह सब एक ही कहानी बताता है—
**या विभाग को पता नहीं था — जो असंभव है…
या विभाग ने जानबूझकर आंखें मूंद लीं — जो सबसे खतरनाक है।**
🟣 क्या शुभम जायसवाल को विभागीय संरक्षण मिला?
कई सूत्र बताते हैं कि—
- जांच औपचारिक
- छापेमारी प्रतीकात्मक
- रिपोर्ट कमजोर
- लाइसेंस मंजूरी तेज
- और शासन को भेजी गई रिपोर्ट भ्रामक
इन सबको जोड़ने पर सवाल खड़े होते हैं कि—
👉 क्या शुभम जायसवाल को विभाग के भीतर से सुरक्षा मिली?
👉 किस स्तर पर किसने फाइलें तेज कराईं?
👉 क्यों कोई अफसर सक्रिय रूप से कार्रवाई नहीं कर रहा था?
🛑 मुख्यालय भी सवालों से घिरा—बिना सत्यापन के रिपोर्ट कैसे मंजूर कर दी?
सबसे चौंकाने वाला हिस्सा यह है कि—
- रेंज से गलत रिपोर्ट आई
- मुख्यालय ने जांच नहीं की
- और शासन को सीधे भेज दी गई
यानी पूरे सिस्टम ने एक साथ फेल किया।
🚨 नतीजा: कोडीन माफिया मज़बूत, सिस्टम बेबस
लाइसेंस–निरीक्षण–प्रवर्तन–रिपोर्ट
चारों स्तंभ एक साथ ध्वस्त पाए गए।
यही कारण है कि—
कोडीन माफिया लगातार फलते-फूलते रहे
और विभाग कमजोर रिपोर्टों के सहारे शासन को गुमराह करता रहा
🔥 अवधभूमि का निष्कर्ष: यह केवल शुभम का खेल नहीं — पूरा सिस्टम संदिग्ध है
इस कांड ने बता दिया कि—
- लाइसेंस देने वाले अधिकारी
- निरीक्षण टीम
- प्रवर्तन अधिकारी
- रेंज की रिपोर्टिंग
- और मुख्यालय का सत्यापन
सभी पर मजबूत जांच अनिवार्य है।
यह कांड सिर्फ एक कारोबारी का नहीं,
पूरा विभागीय सिस्टम एक बड़े सर्जिकल एक्सपोज़र की मांग करता है।




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