
प्रतापगढ़ में ट्रांसफर सीजन शुरू होते ही विकास भवन एक बार फिर चर्चाओं के केंद्र में आ गया है। जिला विकास अधिकारी और जिला पंचायत राज अधिकारी स्तर से होने वाले तबादलों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि जहां एक ओर शासन मानव संपदा पोर्टल के जरिए पारदर्शी ट्रांसफर व्यवस्था लागू करने की बात करता है, वहीं दूसरी ओर कथित रूप से कुछ “चहेते” कर्मचारियों के लिए नियमों से अलग रास्ते निकाल लिए जाते हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा डीसी मनरेगा, जो वर्तमान में प्रभारी जिला विकास अधिकारी भी हैं, को लेकर हो रही है। आरोपों के केंद्र में उनके निजी सहायक रणवीर सिंह पटेल हैं, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वह एक दशक से अधिक समय से प्रतापगढ़ में जमे हुए हैं, लेकिन अब तक उनका ट्रांसफर नहीं हुआ। सवाल यह उठ रहा है कि जब सामान्य कर्मचारियों पर तबादले का दबाव बनाया जाता है तो फिर कुछ लोगों को संरक्षण क्यों मिलता है?
इसी तरह संजय यादव का मामला भी कर्मचारियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। आरोप है कि उन्हें नियमों के विपरीत चार एसीपी का लाभ दे दिया गया। यदि ऐसा हुआ है तो यह न केवल वित्तीय अनियमितता का मामला है बल्कि विभागीय नियमों की निष्पक्षता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
जिला पंचायत राज अधिकारी कार्यालय की स्थिति को लेकर भी कम सवाल नहीं उठ रहे। वहां कई वरिष्ठ लिपिक वर्षों से एक ही स्थान पर जमे बताए जा रहे हैं। कर्मचारियों के बीच आम चर्चा है कि “जुगाड़ तंत्र” के सहारे तबादले रुकवाए जा रहे हैं, जबकि शासन की मंशा लंबे समय से एक ही जगह तैनाती खत्म करने की रही है।
सबसे बड़ा सवाल अब नवागत जिलाधिकारी की कार्यशैली को लेकर उठ रहा है। क्या वह विकास भवन में वर्षों से जमी कथित मनमानी और ट्रांसफर खेल पर सख्ती दिखाएंगे या फिर सब कुछ पहले की तरह चलता रहेगा? क्योंकि विकास भवन के अंदर यह भी आम चर्चा है कि मुख्य विकास अधिकारी स्तर से तमाम अनियमितताओं की अनदेखी की जाती रही है, जिसके चलते कर्मचारियों और अधिकारियों के हौसले बुलंद हैं।
अब निगाहें इस बात पर टिक गई हैं कि प्रतापगढ़ प्रशासन “मानव संपदा पोर्टल” और शासन की ट्रांसफर नीति को वास्तव में लागू करता है या फिर विकास भवन में एक बार फिर नियमों पर ‘प्रभाव और पहुंच’ भारी पड़ती दिखाई देगी।




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