
मथुरा | अवध भूमि न्यूज़
मथुरा जनपद में शराब की दुकानों पर ओवररेटिंग का मामला सामने आया है, जिसने आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में कथित रूप से एक दुकान पर निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत वसूलते हुए देखा गया। वीडियो के अनुसार ₹190 अंकित मूल्य वाली बीयर को ₹200 में बेचा गया और जब ग्राहक ने बिल मांगा तो देने से इनकार कर दिया गया। यह स्थिति उपभोक्ता अधिकारों और आबकारी नियमों दोनों का उल्लंघन मानी जा रही है।
दुकान संचालक द्वारा कीमत बढ़ने का हवाला दिया जा रहा है, जबकि नियमानुसार एमआरपी से अधिक वसूली प्रतिबंधित है। ऐसे में अतिरिक्त वसूली की जा रही राशि को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। इस पूरे प्रकरण ने विभागीय निगरानी और जवाबदेही को लेकर बहस तेज कर दी है।
गौरतलब है कि ओवररेटिंग और अवैध शराब बिक्री पर नियंत्रण के लिए उच्च स्तर पर नियमित बैठकें आयोजित की जाती हैं, लेकिन इसके बावजूद इस तरह की घटनाएं सामने आना जमीनी स्तर पर कमजोर अमल की ओर इशारा करता है।
जिम्मेदारी का दायरा—किसकी क्या भूमिका?
आबकारी तंत्र में हर स्तर पर स्पष्ट जिम्मेदारी तय है, जिसके बावजूद ऐसी घटना सामने आना सवाल खड़े करता है—
प्रमुख सचिव (आबकारी):
राज्य स्तर पर नीतियां बनाना और एमआरपी पालन के निर्देश जारी करना इनकी जिम्मेदारी है। मॉनिटरिंग सिस्टम को मजबूत रखना और जिलों की समीक्षा कर कार्रवाई सुनिश्चित करना भी इनके दायरे में आता है। शिकायतों पर त्वरित निर्णय लेना और जवाबदेही तय करना अपेक्षित होता है।
कमिश्नर (आबकारी):
पूरे क्षेत्र में नियमों के अनुपालन की निगरानी करना और अधीनस्थ अधिकारियों को सख्त निर्देश देना इनकी जिम्मेदारी है। आकस्मिक निरीक्षण की योजना बनाना और गंभीर मामलों में कार्रवाई सुनिश्चित करना भी इनकी भूमिका में शामिल है।
एडिशनल कमिश्नर:
कमिश्नर के निर्देशों को लागू कराना, जिलों की रिपोर्ट का विश्लेषण करना और विशेष अभियान चलवाना इनकी जिम्मेदारी है। कार्यप्रणाली में कमी पाए जाने पर सुधार कराना भी अपेक्षित है।
जॉइंट एक्साइज कमिश्नर:
जोन स्तर पर दुकानों की निगरानी, जिला अधिकारियों से रिपोर्ट लेना और अनियमितताओं की जानकारी उच्च स्तर तक पहुंचाना इनकी भूमिका है। निरीक्षण के दौरान गड़बड़ी मिलने पर तत्काल हस्तक्षेप जरूरी होता है।
टास्क फोर्स:
ओवररेटिंग और अवैध बिक्री के खिलाफ अभियान चलाना, छापेमारी करना और दोषियों को पकड़ना इसका कार्य है। स्थानीय स्तर पर सक्रिय निगरानी बनाए रखना इसकी जिम्मेदारी है।
डिप्टी एक्साइज कमिश्नर:
क्षेत्र में आबकारी व्यवस्था का संचालन, दुकानों की जांच और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करना इनकी जिम्मेदारी है। निरीक्षकों की कार्यप्रणाली की निगरानी भी इन्हीं के अधीन आती है।
जिला आबकारी अधिकारी:
जिले की दुकानों पर सीधी नजर रखना, ओवररेटिंग और बिना बिल बिक्री पर कार्रवाई करना इनका प्रमुख दायित्व है। लाइसेंसधारियों पर नियंत्रण और रिपोर्टिंग भी इन्हीं की जिम्मेदारी है।
आबकारी निरीक्षक:
मौके पर जाकर दुकानों का निरीक्षण करना, एमआरपी पालन सुनिश्चित करना और उल्लंघन पर रिपोर्ट तैयार करना इनकी जिम्मेदारी है। दुकानदारों को नियमों का पालन कराना भी इन्हीं के स्तर पर होता है।
प्रवर्तन (Enforcement):
छापेमारी कर अवैध गतिविधियों पर रोक लगाना और कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना इसकी जिम्मेदारी है। अन्य एजेंसियों के साथ समन्वय भी आवश्यक होता है।
ईआईबी (Excise Intelligence Bureau):
खुफिया जानकारी जुटाकर संगठित गड़बड़ियों का पता लगाना और बड़े नेटवर्क को उजागर करना इसका कार्य है। उच्चाधिकारियों को रणनीतिक इनपुट देना इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
निष्कर्ष:
जब इतने स्तरों पर जिम्मेदारी तय है, तब मथुरा में सामने आया यह मामला सिर्फ एक दुकान की गलती नहीं बल्कि निगरानी तंत्र की कमजोरी की ओर इशारा करता है। फिलहाल आवश्यकता है निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की, ताकि जनता का भरोसा बहाल हो सके।
वायरल वीडियो का लिंकयहां खोलें:
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