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कोरोना काल की शराब तस्करी, SIT निष्कर्ष और ‘इनाम’ जैसी पोस्टिंग्स: आबकारी विभाग में जवाबदेही पर सवाल:


कोरोना काल की शराब तस्करी, SIT निष्कर्ष और ‘इनाम’ जैसी पोस्टिंग्स: आबकारी विभाग में जवाबदेही पर सवाल
लखनऊ।
कोरोना महामारी के दौरान उत्तर प्रदेश के कई जनपदों में सामने आई टपरी (सहारनपुर) डिस्टलरी से जुड़ी अवैध शराब तस्करी पर गठित विशेष जांच टीम (SIT) की रिपोर्ट और उसी अवधि के आबकारी विभागीय निर्णयों को साथ रखकर देखने पर एक गंभीर प्रशासनिक विरोधाभास उभरता है।
जहाँ SIT की जाँच में कई मंडलों में करोड़ों रुपये की अवैध शराब की आपूर्ति के तथ्य सामने आए, वहीं उन्हीं मंडलों की निगरानी के लिए जिम्मेदार रहे कुछ अधिकारी बाद में महत्वपूर्ण और संवेदनशील पदों पर तैनात दिखाई देते हैं।
SIT जाँच: किन मंडलों में अवैध आपूर्ति के तथ्य
SIT जाँच के निष्कर्षों के अनुसार, कोरोना काल में:
सहारनपुर की टपरी डिस्टलरी से
उन्नाव, जौनपुर, बदायूं, संभल सहित
प्रदेश के कई जनपदों में
संगठित रूप से अवैध शराब की आपूर्ति हुई
यह आपूर्ति उस समय दर्ज की गई जब:
देशव्यापी लॉकडाउन लागू था
ट्रांसपोर्ट और मूवमेंट पर प्रतिबंध थे
वैध फुटकर दुकानें बंद या सीमित थीं
उन्नाव प्रकरण और लखनऊ मंडल की भूमिका
SIT रिकॉर्ड के अनुसार:
उन्नाव जनपद में
कोरोना काल के दौरान
टपरी डिस्टलरी की करोड़ों रुपये की अवैध शराब खपाई गई
उस समय उन्नाव:
लखनऊ मंडल के अंतर्गत आता था
और मंडलीय स्तर पर निगरानी का दायित्व
तत्कालीन डिप्टी एक्साइज कमिश्नर, लखनऊ के पास था
SIT निष्कर्षों के बाद यह तथ्य सामने आता है कि:
उस अवधि में लखनऊ मंडल के डिप्टी एक्साइज कमिश्नर रहे जैनेन्द्र उपाध्याय
बाद में
लखनऊ और आगरा के ज्वाइंट एक्साइज कमिश्नर
तथा ज्वाइंट EIB (Excise Intelligence Bureau)
जैसे अहम पदों पर तैनात किए गए
इस पर सवाल उठ रहे हैं कि:
यदि SIT निष्कर्षों में संबंधित मंडल में व्यापक अवैध आपूर्ति दर्ज है
तो निगरानी स्तर पर जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की गई?
जौनपुर प्रकरण और वाराणसी मंडल
इसी तरह SIT जाँच में:
जौनपुर जनपद में
टपरी डिस्टलरी की
करोड़ों रुपये की अवैध शराब की आपूर्ति
के तथ्य सामने आए
SIT रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि:
उस समय वाराणसी मंडल के
तत्कालीन डिप्टी एक्साइज कमिश्नर, दिलीपमणि त्रिपाठी
से जुड़े मामलों में
पर्यवेक्षणीय दायित्व (Supervisory Responsibility)
के समुचित निर्वहन का अभाव पाया गया
हालांकि:
SIT द्वारा चिन्हित इस चूक के बावजूद
किसी दंडात्मक कार्रवाई के बजाय
संबंधित अधिकारी को
मेरठ और लखनऊ
तथा अतिरिक्त रूप से ज्वाइंट जैसे महत्वपूर्ण प्रभार
सौंपे जाने की स्थिति सामने आई
SIT निष्कर्ष बनाम प्रशासनिक निर्णय
इन दोनों मामलों में एक समान पैटर्न दिखाई देता है:
SIT जाँच में
अवैध आपूर्ति के तथ्य
और निगरानी स्तर की विफलता
जबकि प्रशासनिक स्तर पर
दंड के बजाय
महत्वपूर्ण तैनाती और अतिरिक्त प्रभार
विशेषज्ञों का कहना है कि:
यदि SIT किसी अवधि में व्यापक अवैध गतिविधि दर्ज करती है,
तो उसी अवधि के प्रशासनिक निर्णयों की भी समीक्षा आवश्यक होती है।
राजस्व आंकड़ों से जुड़ता है मामला
यही वह बिंदु है जहाँ:
SIT जाँच
और कोरोना काल के आबकारी राजस्व आंकड़े
एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
एक ओर:
अवैध शराब की आपूर्ति
वैध चैनलों का बाधित होना
दूसरी ओर:
विभागीय आंकड़ों में
अपेक्षित तीव्र राजस्व गिरावट का अभाव
इस विरोधाभास ने यह सवाल और गहरा कर दिया है कि:
क्या राजस्व प्रस्तुति,
निगरानी तंत्र
और पोस्टिंग नीति
को एक साथ देखकर मूल्यांकन किया गया?
क्यों उठ रही है उच्च स्तरीय जाँच की मांग
जानकारों के अनुसार:
SIT जाँच ने
जिला और मंडल स्तर की तस्वीर सामने रखी
लेकिन
नीति निर्धारण
राजस्व आंकड़ों की प्रस्तुति
और वरिष्ठ स्तर की भूमिका


SIT के दायरे से बाहर रही
इसी कारण अब यह मांग तेज हो रही है कि:
टपरी डिस्टलरी से जुड़ी अवैध शराब तस्करी पर SIT निष्कर्षों,
कोरोना काल के राजस्व आंकड़ों
और उस अवधि की पोस्टिंग/तैनाती नीतियों की
संयुक्त और स्वतंत्र जाँच कराई जाए।
निष्कर्ष
यह मामला अब:
केवल अवैध शराब तस्करी का नहीं
बल्कि
SIT द्वारा दर्ज तथ्यों और
उनके बाद लिए गए प्रशासनिक निर्णयों के बीच
स्पष्ट अंतर का है।
जिसका समाधान:
आंतरिक स्पष्टीकरण से नहीं
बल्कि
स्वतंत्र, उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जाँच से ही संभव माना जा रहा है।

राजस्व आंकड़ों पर क्यों उठ रहे सवाल:राजस्व आंकड़ों पर क्यों उठ रहे

कोरोना कल के राजस्व आंकड़ों पर क्यों उठ रहे सवाल:



कोरोना महामारी के दौरान आबकारी विभाग द्वारा जारी किए गए राजस्व आंकड़ों में कई ऐसे सांख्यिकीय और नीतिगत विरोधाभास दिखाई देते हैं, जो सामान्य आर्थिक तर्क और उस समय की जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते। पहला, जिस अवधि में देशव्यापी लॉकडाउन, ट्रांसपोर्ट पर रोक, डिस्टलरी संचालन में बाधा और फुटकर दुकानों की लंबे समय तक बंदी रही, उसी अवधि में राजस्व लक्ष्य लगातार बढ़ाए गए, जबकि असाधारण परिस्थितियों में सामान्यतः लक्ष्य घटाए या संशोधित किए जाते हैं। दूसरा, वास्तविक राजस्व में गिरावट तो दर्ज है, लेकिन वह गिरावट देसी शराब (जो कुल राजस्व का लगभग 40% योगदान देती है) के ठप या अत्यधिक प्रभावित होने के अनुपात में नहीं दिखती; यदि मोलासेस से तैयार एथेनॉल का बड़ा हिस्सा सैनिटाइजर निर्माण और निशुल्क वितरण में गया, तो देसी शराब उत्पादन और उससे जुड़े राजस्व में कहीं अधिक तीव्र गिरावट परिलक्षित होनी चाहिए थी। तीसरा, राजस्व प्रस्तुति में “लक्ष्य बनाम वास्तविक” तुलना को इस तरह उभारा गया कि वर्ष-दर-वर्ष वास्तविक गिरावट (पिछले वर्ष के वास्तविक राजस्व से तुलना) धुंधली पड़ जाती है—यह प्रस्तुतीकरण नीति-विफलता के बजाय मात्रा (absolute number) को उपलब्धि की तरह दिखाता है। चौथा, एडवांस इंडेंट/कोटा जैसे पूर्वानुमानों को वास्तविक बिक्री के समकक्ष मानकर राजस्व आकलन करने की आशंका पैदा होती है, जबकि लॉकडाउन में न उठान संभव था, न बिक्री; यह लेखांकन और ऑडिट सिद्धांतों से टकराता है। पाँचवां, मोलासेस–एथेनॉल–सैनिटाइजर के उत्पादन, स्टॉक और वितरण का पृथक, समेकित और सार्वजनिक रिकंसिलिएशन राजस्व विश्लेषण के साथ संलग्न नहीं दिखता, जिससे यह स्पष्ट नहीं होता कि वैध शराब राजस्व पर इस डायवर्जन का वास्तविक प्रभाव कितना पड़ा। छठा, जिन जिलों/मंडलों में SIT जाँच के अनुसार अवैध आपूर्ति सक्रिय पाई गई, वहाँ वैध चैनल बाधित होने के बावजूद राजस्व के आंकड़े अपेक्षाकृत संतुलित दिखते हैं—यह ग्राउंड रियलिटी और सांख्यिकीय आउटपुट के बीच गैप को रेखांकित करता है। सातवां, कोरोना जैसे “एक्सेप्शनल पीरियड” के लिए अपेक्षित करेक्शन फैक्टर/इम्पैक्ट एनालिसिस (लॉकडाउन-डे वेटेज, शटडाउन अवधि, श्रेणीवार गिरावट) राजस्व तालिकाओं में स्पष्ट रूप से परिलक्षित नहीं है। आठवां, लक्ष्य निर्धारण, कोटा आवंटन और राजस्व प्रस्तुति—तीनों का नीतिगत संरेखण उस समय की वास्तविक बाधाओं से कटता हुआ दिखता है, जिससे यह संदेह पैदा होता है कि आंकड़े आर्थिक यथार्थ के बजाय नैरेटिव मैनेजमेंट की जरूरतों के अनुरूप प्रस्तुत किए गए।

राजस्व आंकड़ों पर क्यों उठ रहे सवाल:


1️⃣ क्या यह सीधे-सीधे “आंकड़ों का घोटाला” है?
कानूनी भाषा में अभी इसे सीधा घोटाला कहना मुश्किल है,
लेकिन यह स्पष्ट रूप से “नीतिगत और प्रशासनिक गड़बड़ी” है — और
जांच हो तो यह घोटाले की शक्ल ले सकता है।
 फर्क समझिए:
घोटाला (Scam) → जब जानबूझकर गलत आंकड़े बनाकर लाभ लिया जाए
नीतिगत गड़बड़ी → जब हालात जानते हुए भी अव्यावहारिक फैसले लिए जाएँ
यह मामला दोनों के बीच खड़ा है।
2️⃣ असली सवाल:
❓ जब दुकानें बंद थीं, तब मासिक/दैनिक कोटा कैसे तय हुआ?
 सच्चाई (प्रशासनिक प्रक्रिया के हिसाब से)
आबकारी में सामान्यतः:
सालाना लक्ष्य →
मासिक लक्ष्य →
दैनिक औसत बिक्री →
इसी आधार पर:
कोटा
लाइसेंस फीस
नवीनीकरण राशि
तय होती है।
लेकिन कोरोना में:
दुकानें पूरी तरह/आंशिक रूप से बंद
बिक्री शून्य या बहुत सीमित
आवाजाही प्रतिबंधित
इसके बावजूद:
पुराने वर्षों के औसत को आधार बना लिया गया
मानो हालात “सामान्य” हों
➡️ यही सबसे बड़ा खेल है।
3️⃣ क्या यह नियमों के खिलाफ था?
⚠️ हाँ, सवाल उठता है
क्योंकि:
आपदा/फोर्स मेज्योर (Force Majeure) की स्थिति में
 लक्ष्य पुनरीक्षण (Revision) होना चाहिए था
कई राज्यों में:
लाइसेंस फीस घटाई गई
कोटा रोका गया
लेकिन यहाँ:
लक्ष्य बढ़े
कोटा तय हुआ
भुगतान का दबाव बना
➡️ यह प्रशासनिक मनमानी की श्रेणी में आता है।
4️⃣ फिर दैनिक कोटा किस आधार पर?
 व्यवहारिक सच्चाई
कोटा वास्तविक बिक्री पर नहीं
बल्कि वित्तीय लक्ष्य पूरा दिखाने के लिए तय किया गया
यानि:
“बिक्री हो या न हो,
सरकार को तय रकम चाहिए।”
➡️ इसे ही कहा जाता है Revenue-Driven Policy, Ground Reality से कटी हुई।
5️⃣ क्या इससे सरकारी आंकड़े “कागजी” नहीं हो गए?
बिलकुल।
क्योंकि:
लक्ष्य कभी मिलने लायक था ही नहीं
फिर भी बजट में दिखाया गया
बाद में कहा गया —
 “लाइसेंसी जिम्मेदार हैं”
➡️ आंकड़े नीति के लिए नहीं, छवि के लिए बनाए गए।
6️⃣ अगर जांच एजेंसी पूछे तो ये सवाल बनते हैं
✔️ दुकान बंदी के आदेश के बावजूद कोटा क्यों तय हुआ
✔️ किस नियम के तहत मासिक लक्ष्य तय किया गया
✔️ क्या Force Majeure लागू किया गया
✔️ लाइसेंसी से वसूली का दबाव क्यों
✔️ क्या नुकसान की भरपाई निजी पक्ष से कराई गई
 इन सवालों के जवाब नहीं हैं, सिर्फ फाइल नोटिंग है।
7️⃣ निष्कर्ष (स्पष्ट शब्दों में)
“यह अभी घोषित घोटाला नहीं,
लेकिन यह घोटाले की पूरी ज़मीन तैयार करने वाली नीति थी।”

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