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मेरठ–हस्तिनापुर बेल्ट में ‘जहरीला नेटवर्क’! बंटी जीरा शराब की ट्रैकिंग से खुल सकते हैं राज, फिर भी विभाग खामोश क्यों?


मेरठ–हस्तिनापुर बेल्ट में ‘जहरीला नेटवर्क’! बंटी जीरा शराब की ट्रैकिंग से खुल सकते हैं राज, फिर भी विभाग खामोश क्यों?
Published By: अवध भूमि न्यूज़ | मेरठ/हस्तिनापुर डेस्क
 प्रस्तावना
मेरठ, हस्तिनापुर और किला परीक्षितगढ़ क्षेत्र में अवैध शराब और मिलावट के आरोपों के बीच अब एक नया और बेहद अहम सवाल खड़ा हो गया है।
हाल ही में पकड़ी गई “बंटी जीरा” ब्रांड की शराब इस पूरे नेटवर्क की कड़ियां खोल सकती है, लेकिन आबकारी विभाग की ओर से इस दिशा में ठोस कार्रवाई या खुलासा अब तक सामने नहीं आया है।
 बंटी जीरा शराब: हर बोतल में छिपी पूरी कहानी
आबकारी विभाग के “ट्रैक एंड ट्रेस” सिस्टम के तहत हर शराब के टेट्रा पैक/बोतल पर एक यूनिक कोड, होलोग्राम और बारकोड होता है।
 स्कैन करने पर मिल सकती है पूरी जानकारी:
शराब किस डिस्टलरी में बनी
बैच नंबर क्या है
किस CL2 गोदाम में सप्लाई हुई
और आखिर किस रिटेल दुकान पर बिक्री के लिए भेजी गई
 यानी, “बंटी जीरा” की पकड़ी गई हर बोतल खुद एक सबूत (Evidence) बन सकती है।
 बड़ा सवाल: ट्रैकिंग संभव है, फिर जांच क्यों नहीं?
जब तकनीक इतनी स्पष्ट जानकारी देने में सक्षम है, तो सवाल उठता है:
क्या पकड़ी गई शराब का स्कैन किया गया?
अगर किया गया, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं?
अगर नहीं किया गया, तो क्यों नहीं?
 यह वही डेटा है जो:
सप्लाई चेन की पूरी कड़ी खोल सकता है
जिम्मेदार डिस्टलरी, गोदाम और दुकान की पहचान कर सकता है
और पूरे नेटवर्क को बेनकाब कर सकता है
⚠️ क्या कुछ छुपाने की कोशिश हो रही है?
स्थानीय स्तर पर अब यह सवाल भी तेजी से उठ रहा है कि:
क्या विभाग जानबूझकर ट्रैक एंड ट्रेस डेटा को सार्वजनिक नहीं कर रहा?
क्या इससे जुड़े बड़े नाम सामने आने का डर है?
या फिर जांच की दिशा को सीमित रखने की कोशिश की जा रही है?
 क्योंकि अगर “बंटी जीरा” के हर पैक को ट्रेस किया जाए, तो यह साफ हो सकता है कि:
मिलावट कहां हुई
सप्लाई चेन में कहां गड़बड़ी हुई
और जिम्मेदार कौन है
⚠️ दुकानों पर मिलावट के आरोप से जुड़ता मामला
मेरठ की दुकानों पर टेट्रा पैक में इंजेक्शन के जरिए मिलावट की जो चर्चाएं हैं,
अगर वे सही हैं, तो:
 ट्रैकिंग से यह भी पता चल सकता है कि
मूल पैक कहां से आया
और उसके बाद उसमें छेड़छाड़ कहां हुई
 यानी, यह तकनीक मूल स्रोत और छेड़छाड़ की लोकेशन दोनों को जोड़ सकती है।
 अधिकारियों की भूमिका और बढ़ी जिम्मेदारी
अब इस पूरे मामले में अधिकारियों की जिम्मेदारी और भी ज्यादा बढ़ जाती है:
जिला आबकारी अधिकारी → स्कैनिंग और जांच की पहल
डिप्टी/जॉइंट कमिश्नर → रिपोर्ट की समीक्षा और कार्रवाई
कमिश्नर → पारदर्शिता सुनिश्चित करना
प्रमुख सचिव → सिस्टम के सही उपयोग की निगरानी
❓ सवाल यह है कि:
क्या इन स्तरों पर “ट्रैकिंग डेटा” की समीक्षा हो रही है?
क्या किसी अधिकारी ने सार्वजनिक रूप से इस पर बयान दिया?
⚠️ सिस्टम है, लेकिन इस्तेमाल नहीं?
यह मामला अब एक बड़े विरोधाभास को सामने ला रहा है:
 एक तरफ:
आधुनिक डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम
 दूसरी तरफ:
जमीनी स्तर पर मिलावट और अवैध सप्लाई
❓ क्या सिस्टम सिर्फ कागजों तक सीमित है?
❓ या फिर जानबूझकर इसका पूरा उपयोग नहीं किया जा रहा?
⚠️ जनहित बनाम विभागीय चुप्पी
यह केवल एक प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि सीधे-सीधे जनस्वास्थ्य और जनसुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है।
जहरीली शराब से जान का खतरा
उपभोक्ताओं के साथ धोखा
और सिस्टम पर भरोसे का संकट
 निष्कर्ष: सच सामने लाने का वक्त
“बंटी जीरा” शराब की ट्रैकिंग इस पूरे मामले की सबसे मजबूत कड़ी बन सकती है।

लेकिन जब तक विभाग इस दिशा में खुलकर कदम नहीं उठाता,
तब तक सवाल यही रहेगा—
क्या यह सिर्फ लापरवाही है… या कुछ छुपाने की कोशिश?

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