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जौनपुर आबकारी विभाग में कथित रिश्वतखोरी का मामला: कोर्ट के आदेश पर निरीक्षक और सिपाही के खिलाफ FIR, अब तत्कालीन डिप्टी एक्साइज कमिश्नर की भूमिका पर भी उठे सवाल

पर भी उठे सवाल

जौनपुर। जौनपुर आबकारी विभाग में कथित रिश्वतखोरी, अवैध वसूली और धमकी के एक मामले ने नया मोड़ ले लिया है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) जौनपुर के आदेश पर आबकारी निरीक्षक आदित्य सिंह और आबकारी सिपाही शुजाउद्दीन के खिलाफ थाना लाइनबाजार में मुकदमा दर्ज होने के बाद अब शिकायतकर्ता ने आबकारी आयुक्त प्रयागराज को प्रार्थना पत्र भेजकर दोनों कर्मचारियों के निलंबन, विभागीय कार्रवाई और मामले से जुड़े अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग की है।

शिकायतकर्ता राकेश कुमार सिंह का आरोप है कि उनकी पत्नी के नाम संचालित देशी मदिरा दुकान से वर्षों तक अवैध वसूली की जाती रही और शिकायत के बावजूद विभागीय अधिकारियों ने कार्रवाई नहीं की। अब मुकदमा दर्ज होने के बाद उन्होंने सवाल उठाया है कि आखिर पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध होने के बावजूद आरोपित निरीक्षक के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

क्या है पूरा मामला?

एफआईआर के अनुसार लाइनबाजार थाना क्षेत्र के हुसेनाबाद निवासी राकेश कुमार सिंह ने न्यायालय में दिए गए प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया कि उनकी पत्नी पूर्व में चोरी बाजार (जलालपुर मार्ग) स्थित देशी मदिरा दुकान का संचालन करती थीं।

शिकायत के अनुसार 24 अगस्त 2024 को आबकारी विभाग में तैनात सिपाही शुजाउद्दीन ने मोबाइल फोन पर संपर्क कर बताया कि विभाग में कुछ आकस्मिक खर्च आ गया है और निरीक्षक आदित्य सिंह से बात करने को कहा। इसके बाद कथित रूप से निरीक्षक आदित्य सिंह ने कहा कि विभागीय खर्च के लिए धन देना होगा।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि बातचीत के दौरान बताया गया कि लगभग 60 हजार रुपये का खर्च आया है और विभिन्न दुकानों से धन एकत्र किया जा रहा है। उनसे 1800 रुपये की मांग की गई। शिकायतकर्ता के अनुसार दुकान सीज करने, पत्नी को जेल भेजने और विभागीय कार्रवाई की धमकी दिए जाने के कारण उन्होंने उसी दिन कार्यालय पहुंचकर 1800 रुपये दे दिए।

एफआईआर में यह भी आरोप लगाया गया है कि निरीक्षक आदित्य सिंह द्वारा पहले से 1500 रुपये प्रतिमाह तथा आकस्मिक निरीक्षण के दौरान 500 रुपये अतिरिक्त लिए जाते रहे। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि क्षेत्र की भांग दुकानों से भी इसी प्रकार अवैध वसूली की जाती रही।

ऑडियो रिकॉर्डिंग और अन्य साक्ष्य देने का दावा

राकेश कुमार सिंह का दावा है कि उनके पास निरीक्षक आदित्य सिंह और सिपाही शुजाउद्दीन से हुई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग मौजूद है। उन्होंने यह रिकॉर्डिंग, शपथपत्र, लिखित बयान तथा अन्य साक्ष्य विभागीय अधिकारियों को उपलब्ध कराए थे।

शिकायत में कहा गया है कि उन्होंने विभिन्न तिथियों पर संबंधित अधिकारियों के समक्ष ऑडियो रिकॉर्डिंग की पेनड्राइव और अन्य दस्तावेज प्रस्तुत किए, लेकिन इसके बावजूद आरोपित कर्मचारियों के विरुद्ध कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

पुलिस से लेकर विभाग तक की शिकायत, फिर पहुंचे अदालत

शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने मामले की शिकायत पुलिस अधीक्षक जौनपुर सहित अन्य अधिकारियों से भी की थी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जौनपुर के आदेश पर थाना लाइनबाजार में मुकदमा संख्या 0226/2026 दर्ज किया गया। एफआईआर में आबकारी निरीक्षक आदित्य सिंह और आबकारी सिपाही शुजाउद्दीन को नामजद किया गया है। मामले की विवेचना उपनिरीक्षक संतोष कुमार सिंह को सौंपी गई है।

अब निलंबन और सेवा लाभ रोकने की मांग

मुकदमा दर्ज होने के बाद शिकायतकर्ता ने 11 जून 2026 को आबकारी आयुक्त प्रयागराज को विस्तृत प्रार्थना पत्र भेजा है। पत्र में कहा गया है कि जब दोनों कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज हो चुका है, तब उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाना चाहिए ताकि वे विवेचना को प्रभावित न कर सकें।

प्रार्थना पत्र में विशेष रूप से मांग की गई है कि यदि आबकारी निरीक्षक आदित्य सिंह सेवानिवृत्ति के निकट हैं तो उन्हें मिलने वाले पेंशन फंड और अन्य सेवा लाभों पर अंतिम निर्णय तक रोक लगाई जाए। साथ ही दोनों आरोपित कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई भी शुरू की जाए।

तत्कालीन डिप्टी एक्साइज कमिश्नर की भूमिका पर गंभीर सवाल

पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शिकायतकर्ता द्वारा तत्कालीन डिप्टी एक्साइज कमिश्नर वाराणसी की भूमिका पर उठाए गए सवाल हैं।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि उन्होंने कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग, शपथपत्र और अन्य साक्ष्य विभागीय अधिकारियों को उपलब्ध कराए थे। इसके बावजूद आरोपित निरीक्षक के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में उन्होंने सवाल उठाया है कि जब विभाग के पास कथित रूप से पर्याप्त साक्ष्य मौजूद थे तो निरीक्षक को राहत या क्लीन चिट किस आधार पर दी गई।

शिकायतकर्ता ने मांग की है कि तत्कालीन डिप्टी एक्साइज कमिश्नर वाराणसी की भूमिका की भी जांच कराई जाए और यह पता लगाया जाए कि शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई, जांच किस स्तर पर हुई और आरोपित कर्मचारियों के खिलाफ समय रहते विभागीय कदम क्यों नहीं उठाए गए।

अन्य अधिकारियों की भूमिका की जांच की भी मांग

आबकारी आयुक्त को भेजे गए प्रार्थना पत्र में शिकायतकर्ता ने संयुक्त आबकारी आयुक्त वाराणसी, उप आबकारी आयुक्त वाराणसी प्रभार वाराणसी, जिला आबकारी अधिकारी जौनपुर तथा अन्य संबंधित अधिकारियों को भी प्रतिलिपि भेजी है।

शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि विभागीय अधिकारियों को पहले से शिकायत, ऑडियो रिकॉर्डिंग और अन्य साक्ष्य उपलब्ध थे तो यह जांच होनी चाहिए कि शिकायतों के निस्तारण में किस अधिकारी ने क्या कार्रवाई की और आखिर आरोपित कर्मचारियों के खिलाफ कठोर कदम क्यों नहीं उठाए गए।

कई बड़े सवाल खड़े कर रहा मामला

यह मामला अब केवल कथित रिश्वतखोरी और अवैध वसूली तक सीमित नहीं रह गया है। मुकदमा दर्ज होने के बाद यह प्रश्न भी उठ रहा है कि यदि शिकायतकर्ता के दावे सही हैं और विभाग के पास पहले से साक्ष्य मौजूद थे, तो विभागीय स्तर पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

अब निगाहें पुलिस विवेचना के साथ-साथ संभावित विभागीय जांच पर भी टिकी हैं। यदि जांच में शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि होती है तो मामला केवल दो कर्मचारियों तक सीमित न रहकर विभागीय जवाबदेही का बड़ा प्रश्न बन सकता है।

नोट: उपरोक्त सभी आरोप एफआईआर, न्यायालय में प्रस्तुत प्रार्थना पत्रों और शिकायतकर्ता के दावों पर आधारित हैं। आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण पुलिस विवेचना, विभागीय जांच तथा न्यायालय की कार्यवाही के बाद ही होगा।

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