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मनरेगा में मैटेरियल भुगतान पर GST गड़बड़ी! प्रतापगढ़ के कई ब्लॉकों में टैक्स में बड़ा अंतर उजागर:



वित्तीय वर्ष 2025-26 के तहत प्रतापगढ़ जिले में मनरेगा के खर्च का विश्लेषण करने पर मैटेरियल मद में किए गए भुगतान और उस पर दिए गए GST में गंभीर अनियमितताओं के संकेत मिल रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कई ब्लॉकों में मैटेरियल पर भुगतान तो किया गया, लेकिन उसके अनुपात में GST या तो कम दिया गया है या फिर गणना में अंतर दिखाई दे रहा है।
यदि सामान्य रूप से 18% GST दर को आधार माना जाए, तो ब्लॉकवार स्थिति इस प्रकार सामने आती है:
आसपुर देवसरा: मैटेरियल भुगतान लगभग 920.21 लाख, जबकि अनुमानित GST होना चाहिए ~165 लाख, लेकिन दिया गया केवल 4.68 लाख।
बाबा बेलखरनाथ धाम: भुगतान 494.22 लाख, अपेक्षित GST ~89 लाख, जबकि दिया गया 8.48 लाख।
बाबागंज: भुगतान 146.23 लाख, अपेक्षित GST ~26 लाख, जबकि दिया गया 19.01 लाख।
बिहार ब्लॉक: 425.72 लाख पर ~76 लाख GST बनता है, जबकि 56.16 लाख दर्ज।
गौरा: 169.46 लाख पर ~30 लाख अपेक्षित, जबकि 16.42 लाख दिया गया।
कुंडा: 200.62 लाख पर ~36 लाख होना चाहिए, लेकिन 13.16 लाख दर्ज।
पट्टी: 289.87 लाख पर ~52 लाख बनता है, जबकि केवल 15.7 लाख दिया गया।
लगभग सभी ब्लॉकों में यही पैटर्न देखने को मिला—मैटेरियल भुगतान के मुकाबले GST की राशि काफी कम दिखाई गई है।
कुल स्तर पर स्थिति:
कुल मैटेरियल व्यय: 4436.72 लाख
अनुमानित GST (18% के अनुसार): ~798 लाख
वास्तविक दर्ज GST: 300.63 लाख
यानी करीब 500 लाख रुपये से अधिक का अंतर सामने आ रहा है।
क्या कहते हैं नियम?
मनरेगा के तहत मैटेरियल खरीद पर लागू GST का भुगतान निर्धारित दरों के अनुसार होना चाहिए। यदि भुगतान कम दिखाया गया है, तो यह या तो गलत वर्गीकरण, आंशिक भुगतान, या फिर संभावित वित्तीय अनियमितता का संकेत हो सकता है।
जांच की मांग तेज
इस खुलासे के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि:
क्या जानबूझकर GST कम दिखाया गया?
क्या बिलिंग में गड़बड़ी हुई है?
या फिर MIS में डेटा एंट्री में हेरफेर हुआ है?
जिले के वित्तीय प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी अब सवालों के घेरे में है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस अंतर की निष्पक्ष जांच की जाए तो बड़े स्तर पर वित्तीय अनियमितता सामने आ सकती है।
निष्कर्ष:
प्रतापगढ़ में मनरेगा के तहत मैटेरियल भुगतान और GST के बीच भारी अंतर गंभीर वित्तीय गड़बड़ी की ओर इशारा करता है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस पर क्या कार्रवाई करता है।


मनरेगा के इस वित्तीय अंतर के सामने आने के बाद अब सवाल सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि जवाबदेही (Accountability) का है। क्योंकि सभी भुगतान DPC (District Programme Coordinator / जिला कार्यक्रम समन्वयक) और संबंधित Block Development Officer (BDO) के डिजिटल सिग्नेचर/डोंगल से ही फाइनल होते हैं, ऐसे में उनकी भूमिका सीधे तौर पर जांच के दायरे में आती है।
किसकी क्या जिम्मेदारी है?
1. DPC (जिला कार्यक्रम समन्वयक):
जिले में मनरेगा के पूरे वित्तीय प्रबंधन की निगरानी
फंड रिलीज, उपयोग और ऑडिट सुनिश्चित करना
MIS (ऑनलाइन सिस्टम) में सही डेटा एंट्री और सत्यापन
 अगर इतने बड़े स्तर पर GST में अंतर है, तो यह सुपरविजन की कमी या लापरवाही मानी जाएगी।
2. BDO (खंड विकास अधिकारी):
ब्लॉक स्तर पर सभी भुगतान की प्राथमिक जिम्मेदारी
कार्यों की स्वीकृति, बिल पास करना और भुगतान प्रक्रिया
डोंगल के माध्यम से फाइनल ट्रांजेक्शन करना
 ऐसे में बिना सत्यापन के भुगतान करना प्रत्यक्ष जवाबदेही बनाता है।
क्या कार्रवाई होनी चाहिए?
वित्तीय ऑडिट (Special Audit):
पूरे जिले में ब्लॉकवार मैटेरियल भुगतान और GST की स्वतंत्र जांच कराई जाए।
डिजिटल ट्रांजेक्शन की फोरेंसिक जांच:
जिन डोंगल/आईडी से भुगतान हुआ, उनकी लॉग हिस्ट्री और यूजर ट्रेल निकाली जाए।
शो-कॉज नोटिस:
संबंधित DPC और सभी BDO से पूछा जाए कि
 “GST कम क्यों दिखाया गया?”
 “क्या बिल/वाउचर सही थे या नहीं?”
जिम्मेदारी तय कर वसूली (Recovery):
अगर गड़बड़ी साबित होती है, तो संबंधित अधिकारियों से सरकारी धन की रिकवरी की जाए।
निलंबन/विभागीय कार्रवाई:
प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर
BDO पर सस्पेंशन
DPC पर विभागीय जांच (Departmental Inquiry) शुरू होनी चाहिए
FIR दर्ज करने की संभावना:
यदि यह मामला जानबूझकर वित्तीय अनियमितता (Fraud) का साबित होता है, तो
 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज हो सकता है।
निष्कर्ष (कड़ा संदेश):
यह मामला सिर्फ लेखा-जोखा की गलती नहीं दिखता, बल्कि सिस्टम की जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
अगर समय रहते जांच और कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता पर गंभीर असर डालेगा।
अब निगाहें प्रशासन पर हैं—
 क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी या मामला दबा दिया जाएगा?

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