

प्रतापगढ़। लोक निर्माण विभाग के निर्माण खंड 1 में प्रस्तावित भव्य कार्यालय निर्माण को लेकर अब सवाल सीधे औचित्य और जिम्मेदारी पर आ टिके हैं। लगभग 6 करोड़ रुपये के प्रस्तावित बजट ने विभागीय प्राथमिकताओं के साथ-साथ संबंधित अधिशासी अभियंता की भूमिका को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
जब रेनोवेशन हो चुका, तो नया खर्च क्यों?
करीब दो वर्ष पहले ही कार्यालय भवन का रेनोवेशन कराया गया था। उस समय मरम्मत, रंगाई-पुताई, विद्युत कार्य और आंतरिक सुधार पर व्यय हुआ। ऐसे में अब नए सिरे से भव्य निर्माण या बड़े विस्तार का प्रस्ताव यह संकेत देता है कि या तो पूर्व रेनोवेशन औपचारिकता था, या वर्तमान प्रस्ताव आवश्यकता से अधिक बढ़ा-चढ़ाकर तैयार किया गया है।
यदि भवन जर्जर नहीं है और कार्यशील है, तो 6 करोड़ रुपये की मांग का ठोस तकनीकी आधार सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
लागत का गणित—2 करोड़ बनाम 6 करोड़
निर्माण क्षेत्र के जानकार बताते हैं कि सामान्य प्रशासनिक कार्यालय—कमरों, मीटिंग हॉल, रिकॉर्ड रूम, शौचालय, बेसिक फर्निशिंग सहित—करीब 1.5 से 2 करोड़ रुपये में तैयार हो सकता है (मानक दरों पर)।
ऐसे में:
क्या प्रस्तावित भवन का क्षेत्रफल असामान्य रूप से बड़ा है?
क्या उसमें लग्ज़री फिनिशिंग, महंगे इंटीरियर, विशेष फ्रंट एलिवेशन या अतिरिक्त सुविधाएं जोड़ी गई हैं?
क्या अनुमानित लागत में ऐसी मदें शामिल हैं जिनका स्पष्ट औचित्य नहीं है?
जब तक डीपीआर (विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन) और एस्टीमेट ब्रेकअप सार्वजनिक नहीं होता, 4 करोड़ रुपये के अतिरिक्त अंतर पर सवाल बने रहेंगे।
अधिशासी अभियंता की भूमिका पर उठते प्रश्न
सूत्रों का कहना है कि प्रस्ताव की प्रारंभिक संस्तुति और लागत निर्धारण अधिशासी अभियंता स्तर से ही आगे बढ़ाया गया। ऐसे में यह देखना जरूरी है कि:
क्या प्रस्ताव तकनीकी आवश्यकता के आधार पर बना या व्यक्तिगत प्राथमिकता पर?
क्या विभागीय उच्चाधिकारियों को वास्तविक स्थिति से अवगत कराया गया?
क्या पूर्व में सरेंडर हुए सड़क निर्माण फंड की समीक्षा के बिना कार्यालय प्रस्ताव आगे बढ़ाया गया?
यदि जिले में सड़कें जर्जर हैं और पूर्व में बजट खर्च न हो पाने की स्थिति रही है, तो कार्यालय को प्राथमिकता देना विभागीय दृष्टिकोण पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
पहले बजट सरेंडर, अब बड़ा प्रस्ताव
निर्माण खंड 1 पर यह आरोप लग चुका है कि सड़क निर्माण और मरम्मत के लिए आवंटित करोड़ों रुपये समय पर खर्च नहीं किए गए। ऐसे में वही खंड अचानक बड़े बजट वाले कार्यालय प्रस्ताव के साथ सामने आए, तो स्वाभाविक रूप से पारदर्शिता और नीयत पर सवाल उठते हैं।
संभावित ‘खेल’ क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार निर्माण कार्यों में लागत बढ़ाने के सामान्य तरीके होते हैं—
क्षेत्रफल और संरचना का अनावश्यक विस्तार,
महंगी सामग्री और विशेष डिजाइन का हवाला,
अतिरिक्त साइट विकास और लैंडस्केपिंग मद जोड़ना,
संशोधित एस्टीमेट के जरिए लागत बढ़ाना।
यदि ऐसी किसी प्रक्रिया के तहत लागत बढ़ाई गई है तो यह वित्तीय अनुशासन के विपरीत होगा। हालांकि इन आशंकाओं की पुष्टि स्वतंत्र जांच से ही हो सकती है।
क्या होनी चाहिए कार्रवाई?
जनता और नागरिक संगठनों की मांग है कि:
प्रस्ताव की डीपीआर और लागत का मदवार विवरण सार्वजनिक किया जाए।
किसी स्वतंत्र तकनीकी एजेंसी से लागत का मूल्यांकन कराया जाए।
पूर्व में सरेंडर हुए बजट की विभागीय जवाबदेही तय की जाए।
यदि अनियमितता पाई जाए तो संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच हो।
निष्कर्ष
जब जिले में बुनियादी ढांचे की जरूरतें अधूरी हैं, तब 6 करोड़ के ‘भव्य कार्यालय’ का प्रस्ताव प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अधिशासी अभियंता स्तर से आगे बढ़े इस प्रस्ताव की पारदर्शी समीक्षा आवश्यक है, अन्यथा यह मामला उच्च स्तरीय जांच की मांग तक पहुंच सकता है।
जनता का सवाल साफ है—क्या यह प्रशासनिक आवश्यकता है या फिर किसी बड़े खेल की तैयारी?




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