
Uttar Pradesh की नई आबकारी नीति पर बड़ा सवाल
शराब महंगी, डिस्टिलरी मालामाल? पारदर्शिता पर घिरा विभाग
उत्तर प्रदेश में देसी, अंग्रेजी शराब और बीयर के दाम बढ़ने की तैयारी है। नोएडा, गाजियाबाद, लखनऊ, आगरा, मेरठ समेत पूरे प्रदेश में अब शराब पीना महंगा होगा। लेकिन कीमतों से भी बड़ा सवाल उस नई आबकारी नीति पर खड़ा हो गया है, जिसने डिस्टिलरी कारोबारियों को होलसेल लाइसेंस का रास्ता खोल दिया है।
उत्पादन से थोक तक—एक ही हाथ में खेल?
नई व्यवस्था के तहत अब डिस्टिलरी मालिक उत्पादन के साथ-साथ थोक वितरण भी संभाल सकेंगे। यानी फैक्ट्री से लेकर बाजार तक पूरी सप्लाई चेन पर उनका नियंत्रण होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे:
छोटे थोक कारोबारियों की भूमिका खत्म हो सकती है,
बाजार में कुछ बड़े समूहों का वर्चस्व बढ़ सकता है,
और मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता घट सकती है।
विभाग के सामने क्या चुनौती?
सबसे बड़ी चुनौती हितों के टकराव (Conflict of Interest) की है। जब उत्पादक ही थोक विक्रेता होगा, तो निगरानी कौन करेगा?
सूत्रों का कहना है कि विभागीय नियंत्रण पहले की तुलना में कमजोर पड़ सकता है। स्टॉक, बिलिंग और टैक्स की पारदर्शी जांच सुनिश्चित करना कठिन होगा, यदि स्वतंत्र ऑडिट या क्रॉस-वेरीफिकेशन की व्यवस्था मजबूत नहीं की गई।
क्वालिटी जांच भी खुद की लैब में?
नई नीति में यह भी प्रावधान बताया जा रहा है कि शराब की स्ट्रेंग्थ और गुणवत्ता की जांच डिस्टिलरी अपनी ही लैब में करेगी।
यही सबसे बड़ा विवाद का बिंदु बन गया है। सवाल उठ रहे हैं कि:
क्या यह “सेल्फ-सर्टिफिकेशन” मॉडल नहीं है?
यदि गुणवत्ता मानक से कम पाई गई तो जवाबदेही किसकी होगी?
स्वतंत्र सरकारी या थर्ड-पार्टी लैब की भूमिका क्यों सीमित की गई?
विशेषज्ञ मानते हैं कि गुणवत्ता जांच का केंद्रीकरण पारदर्शिता पर सीधा असर डाल सकता है।
‘डील’ की चर्चा—सच या सियासी आरोप?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कुछ प्रमुख शराब उद्यमियों के साथ नीति के कुछ प्रावधानों को लेकर ‘समझौता’ हुआ। हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। लेकिन जिस प्रकार डिस्टिलरी को निगरानी से अपेक्षाकृत मुक्त ढांचा मिला है, उसने सवालों को हवा दे दी है।
जनता पर बोझ, फायदा किसे?
कीमतें बढ़ेंगी तो सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। सरकार राजस्व वृद्धि का तर्क दे सकती है, लेकिन विपक्ष इसे बड़े कारोबारियों को लाभ पहुंचाने की नीति बता रहा है।
निष्कर्ष
नई आबकारी नीति राजस्व बढ़ाने और प्रक्रिया सरल बनाने के नाम पर लाई गई है। लेकिन यदि निगरानी तंत्र मजबूत और स्वतंत्र नहीं हुआ तो यह मॉडल पारदर्शिता, गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धा—तीनों पर सवाल खड़े कर सकता है।
अब नजर इस बात पर है कि विभाग इन आशंकाओं का जवाब कैसे देता है और क्या पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कोई अतिरिक्त तंत्र लागू किया जाएगा।




More Stories
घुसपैठ नहीं रुकी, संख्या करोड़ों में पहुंच गई: सूर्यकांत केलकर
जौनपुर आबकारी विभाग में कथित रिश्वतखोरी का मामला: कोर्ट के आदेश पर निरीक्षक और सिपाही के खिलाफ FIR, अब तत्कालीन डिप्टी एक्साइज कमिश्नर की भूमिका पर भी उठे सवाल
शराब माफिया घोषित हुआ हिस्ट्रीशीटर मनोज जायसवाल, चार सहयोगी भी रडार पर: