
नई दिल्ली। संविधान में परिवर्तन और आरक्षण समाप्त होने जैसी धारणा गरीबों दलितों पिछड़ों और आदिवासियों में काफी मजबूत होती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताकत को देखते हुए दलित और पिछड़ों को लगता है कि वह संविधान में परिवर्तन कर सकते हैं। उन्हें लगता है कि मोदी इतने शक्तिशाली हैं कि वह कुछ भी कर सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह लगातार इस पर अपना बयान दे रहे हैं और यहां तक कह रहे हैं कि स्वयं डॉक्टर अंबेडकर भी संविधान नहीं बदल सकते बावजूद इसके पिछड़े दलित और आदिवासी समाज के लोग संविधान को लेकर काफी ससंकित हैं।
संविधान बदलने का विमर्श मजबूती के साथ दलित पिछड़े और आदिवासी समाज में चल रहा है। दक्षिण में रोहित वेमुला और गुजरात में उन्ना कांड उत्तर प्रदेश में हाथरस उन्नाव और कानपुर के मामले एक बार फिर सुर्खियों में आ गए हैं।
यूपीएससी में छेड़छाड़ सार्वजनिक विभागों का निजीकरण और यूनिवर्सिटी में एक ही जाति वर्ग के प्रोफेसर की तैनाती जैसे मुद्दों ने दलितों पिछड़ों और आदिवासियों को संवेदनशील बना दिया है।
भारत जोड़ो यात्रा का प्रभाव
कन्याकुमारी से कश्मीर तक राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में लगातार दलितों पर छोड़ो आदिवासियों पर जो अत्याचार हुए और किस तरह से सरकार ने भागीदारी से वंचित किया गया जैसे सवाल उठाए गए उसका प्रभाव चुनाव में दिखाई देने लगा है। लोगों ने पूछना शुरू कर दिया है कि केंद्र सरकार के 90 जॉइंट सेक्रेटरी में दलित पिछड़े और आदिवासियों की संख्या कितनी है। यह भी पूछना शुरू किया कि 400 ही क्यों चाहिए जबकि सरकार तो 273 पर ही बन जाती है। दलितों पिछड़ों और आदिवासियों में यह विमर्श नीचे तक गया है कि 400 सीट मिलने पर सरकार संविधान बदल देगी क्योंकि सरकार पहले ही सांसद बदल चुकी है इसलिए संविधान ही बदलना चाहती है। इस विमर्श को लेकर फिलहाल भाजपा और आरएसएस बेचैन है इसका कितना प्रभाव हुआ है और होगा यह 4 जून को ही पता चल पाएगा।




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