
🟥 अवध भूमि न्यूज़ – Investigative Special
“स्क्रीनिंग में कार्मिक विभाग के गुंडागर्दी के शिकार हो सकते हैं ईमानदार कर्मचारी, दागी कर्मचारियों पर होगी मेहरबानी बाहर! —
क्या टपरी शराब कांड सहित बड़े घोटालों में नामित अधिकारियों की समीक्षा करेगी स्क्रीनिंग कमेटी?”
लखनऊ/प्रयागराज — आबकारी विभाग में 50+ कर्मचारियों की अनिवार्य सेवानिवृत्ति वाली स्क्रीनिंग शुरू होते ही अब सबसे बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है—
“टपरी शराब कांड और अन्य बड़े मामलों में वांछित/दोषी अधिकारी आखिर स्क्रीनिंग से बाहर क्यों हैं?” स्टार लाइट ब्रुकेम में डिप्टी आबकारी आयुक्त देवीपाटन मंडल रह चुके वर्तमान जॉइंट एक्साइज कमिश्नर दिलीप कुमार मणि त्रिपाठी जिन्होंने 58000 लीटर का ऑफलाइन परमिट जारी किया और बड़े घोटाले की बुनियाद रखी क्या उन्हें स्क्रीनिंग के दायरे में लाया जा सकेगा वहीं वर्तमान डिप्टी एक्साइज कमिश्नर देवीपाटन मंडल आलोक कुमार जिन्होंने घोटालेबाजों को बचाने के लिए विभाग को दो अलग-अलग जांच रिपोर्ट भेजी क्या उन पर भी स्क्रीनिंग कमेटी कार्रवाई करेगी इतना ही नहीं बदायूं में जिला आबकारी अधिकारी रहते हुए अवैध रूप से 15 ट्रक शराब को cl2 में रखना और बेचने के मामले में आरोपी बने वर्तमान जिला आबकारी अधिकारी प्रयागराज जिनकी भूमिका सवालों के घेरे में है क्या वह भी स्क्रीनिंग कमेटी के दायरे में आ सकेंगे।
यह सवाल न सिर्फ विभागीय कर्मचारियों में आक्रोश पैदा कर रहा है बल्कि आदेश की विश्वसनीयता पर भी गंभीर संदेह खड़ा कर रहा है।
👉 टपरी शराब कांड के आरोपी अधिकारी ‘स्क्रीनिंग से बाहर’—क्या यह सुरक्षा कवच?
सूत्रों के अनुसार, टपरी शराब कांड और अवैध शराब सप्लाई से जुड़े कुछ अधिकारी अभी तक विभागीय जांच से बचते रहे हैं।
जबकि उनका नाम—
• गड़बड़ी
• मिलीभगत
• शिथिल पर्यवेक्षण
• लाइसेंसिंग अनियमितता
—जैसे गंभीर आरोपों में सामने आ चुका है।
फिर भी, इन दागी अधिकारियों के नाम अब तक किसी भी स्क्रीनिंग सूची में नहीं दिख रहे।
यही वजह है कि अब विभागीय कर्मचारी सीधा सवाल उठा रहे हैं:
“क्या स्क्रीनिंग सिर्फ कमजोर, बिना गॉडफादर वाले कर्मचारियों पर चलाई जा रही है?”
👉 आदेश की असली कमजोरी — ‘दोषी और वांछित’ को बचाने का रास्ता खुला
आदेश में 50 वर्ष से अधिक आयु वालों की दक्षता और ईमानदारी की जांच की बात कही गयी है।
लेकिन—
❗ बड़े घोटालों में शामिल अधिकारियों को स्पष्ट रूप से शामिल करने का कोई प्रावधान नहीं है
❗ वांछित/जांच-लंबित अधिकारियों को प्राथमिकता देने का कोई उल्लेख नहीं है
❗ जिनके खिलाफ C&V में केस लंबित हैं—उन्हें भी स्क्रीनिंग के दायरे से बाहर रखा जा सकता है
यही सबसे बड़ा loophole है।
👉 विभागीय कर्मचारियों की तगड़ी आपत्ति—‘घोटालेबाज बचेंगे, ईमानदार कटेगा?’
कई जिलों के कर्मचारियों ने गुप्त रूप से बताया कि:
- जिनके छोटे-छोटे अनुशासनात्मक मामले एडिशनल कमिश्नर/कमिश्नर/प्रमुख सचिव के यहां पेंडिंग हैं, उन्हें स्क्रीनिंग में सबसे पहले निशाना बनाया जा रहा है।
- लेकिन जिनके नाम करोड़ों की टपरी शराब खेप, अवैध सप्लाई, ट्रक पासिंग, और थोक लाइसेंस घपलों से जुड़े हैं—उनकी फाइलें “ऊपर से निर्देश” बताकर रोक दी जाती हैं।
यही दोहरा मापदंड पूरे आदेश को सवालों के घेरे में डाल रहा है।
👉 बड़ा सवाल: क्या यह कार्रवाई “सेलेक्टिव क्लीनअप” है?
विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश तभी सार्थक होता जब इसमें स्पष्ट किया जाता कि—
1️⃣ बड़े घोटालों में नामित अधिकारी
2️⃣ जिन पर FIR या जांच लंबित है
3️⃣ जिनकी भूमिका विभागीय सिस्टम को नुकसान पहुँचाती है
4️⃣ जिनके खिलाफ राजस्व हानि के प्रमाण हैं
—उनका स्क्रीनिंग में ‘अनिवार्य शामिल होना’ जरूरी है।
लेकिन ऐसा न होने से यह डर गहरा हो रहा है कि:
“कार्रवाई कमजोरों पर, संरक्षण दागियों को।”
👉 अवध भूमि न्यूज़ की पड़ताल जारी
हम यह मुद्दा अगले भाग में उठाएंगे कि—
• किन जिलों में दागी अधिकारी सूची से बाहर हैं
• टपरी शराब कांड से जुड़े किन नामों को बचाया जा रहा है
• स्क्रीनिंग कमेटी की संरचना में किस स्तर पर छूट का दुरुपयोग हो रहा है
अवध भूमि न्यूज़ इस मामले की तह तक जाएगा। सच सामने लाकर रहेगा।




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