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टापरी में कार्रवाई तेज: जिला आबकारी अधिकारी प्रयागराज की तत्कालीन भूमिका को लेकर शासन ने मांगी रिपोर्ट:

टपरी शराब फैक्ट्री कांड — विस्तृत रिपोर्ट

प्रयागराज के आबकारी अधिकारी की भूमिका पर सवाल — कार्मिक अनुभाग से रिपोर्ट मांगी गई, मंत्री कड़ा रुख — विभागीय मिलीभगत के आरोप उभरते हुए

सहारनपुर/प्रयागराज, 11 दिसंबर — टपरी गाँव में स्थित उस शराब फैक्ट्री कांड ने अब विभागीय गलियारों में भूचाल ला दिया है, जिसकी रूपरेखा शुरुआती जांच में सामने आई है। मामले में फैक्ट्री प्रबंधन और आबकारी विभाग के कई अधिकारियों के संबंध पर गंभीर सवाल उठे हैं। पुलिस ने फैक्ट्री से जुड़े एमडी तथा यूनिट हेड समेत केमिस्ट, बारकोड डिस्पेंसर व अन्य सदस्यों को लेकर कुल 27 लोगों पर गैंगस्टर की दर्ज कराई गई है। अधिकारियों के साथ फैक्ट्री प्रबंधन पर गंभीर आरोप हैं कि उन्होंने 11 माह तक अवैध आपूर्ति और रिकॉर्ड में छेड़छाड़ कर कर एवं एक्साइज ड्यूटी में भारी कमी कर राज्य को करोड़ों का नुकसान पहुँचाया — प्रारंभिक अनुमान लगभग 35 करोड़ रुपये के आस-पास बताया जा रहा है।

क्या है मामला — एक नजर

  • अभियोग: आरोप है कि फैक्ट्री में अवैध रूप से देसी शराब तैयार की जा रही थी, साथ ही नकली/छेड़े हुए रिकार्डों के माध्यम से आपूर्ति और बिक्री दर्ज की जा रही थी।
  • वित्तीय हानि: एक्साइज ड्यूटी, जीएसटी और इनकम टैक्स में गहरी गिरावट दिखती है; प्रारंभिक जांच में 35 करोड़ तक की चौराई का संकेत मिला है।
  • कानूनी कदम: देहात कोतवाली पुलिस ने फैक्ट्री से जुड़े 27 नामों पर गैंगस्टर की धारा लगाकर कार्रवाई की है; आरोपियों पर आपराधिक साजिश व बड़े पैमाने पर त्रुटिपूर्ण/फर्जी दस्तावेज बनाने के आरोप हैं।

प्रयागराज के अधिकारी का नाम क्यों जुड़ा?

जांच के दौरान सामने आया कि कुछ अहम कागजात, निरीक्षण रिपोर्ट और अनुमति जिन समय पर जारी हुईं — वे उसी अवधि से संबंधित हैं जब वर्तमान प्रयागराज के जिला आबकारी अधिकारी बदायूं जिले में तैनात थे। इसलिए विभाग ने इस अधिकारी की कार्यकालीन गतिविधियों, आदेशों और संचार का विस्तृत रिकॉर्ड देखने के उद्देश्य से कार्मिक अनुभाग से रिपोर्ट मांगी है। विभागीय कहने का आशय है कि आख्या से यह स्पष्ट होगा कि किन-किन स्तरों पर प्रक्रियागत चूक हुई और किसका कितना दायित्व तय किया जाना चाहिए।

कार्मिक अनुभाग पर देरी — मिल रही हैं सवालिया निगाहें

हालाँकि रिपोर्ट मांगी जा चुकी है, लेकिन विभागीय सूत्रों का कहना है कि कार्मिक अनुभाग रिपोर्ट तैयार करने/फॉरवर्ड करने में असामान्य रूप से धीमा दिख रहा है। इस देरी को लेकर दो तरह की बातें चल रही हैं: एक तरफ कहा जा रहा है कि रिपोर्ट अभी संकलन के कारण विलंबित है; दूसरी तरफ विभाग में अफवाह यह भी है कि जानबूझकर रिपोर्ट को आगे नहीं भेजा जा रहा ताकि कुछ अहम जानकारी सार्वजनिक न हो। इस तरह की देरी ने विभाग के अंदर भ्रष्टाचार-लाभार्थियों की संभावित चैन की चर्चा तेज कर दी है — खासकर तब जब मामले में शामिल कई बड़े आर्थिक हित जुड़े हुए हैं।

विभागीय एक सूत्र ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “रिपोर्ट में अगर उन दस्तावेजों और अधिकारियों के संलग्न दस्तावेजों की स्पष्ट व्याख्या नहीं होगी तो दोषियों तक पहुँच पाना कठिन होगा। इसलिए रिपोर्ट समय पर आना आवश्यक है।”

मंत्री का सख्त रुख — किसी को बख्शा नहीं जाएगा

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए विभागीय मंत्री ने सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट कर दिया है कि वह इस कांड में किसी भी तरह की छूट नहीं देंगे। मंत्री ने कहा है कि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी होगी और यदि विभागीय स्तर पर कोई गड़बड़ी या मिलीभगत पाई जाती है तो उस पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी — जिसमें कैरियर-स्तर के निर्णय और आपराधिक मुकदमे भी शामिल हो सकते हैं।

मंत्री के निर्देशों के बाद कार्मिक अनुभाग पर दबाव बढ़ गया है और बताया जा रहा है कि रिपोर्ट शीघ्रता से मांगी गई फाइलों के साथ उच्च स्तर पर साझा की जाएगी ताकि आगे की कार्रवाई तय की जा सके।

विभागीय कार्रवाई के संभावित रास्ते

मामले की गंभीरता के कारण विभाग और सरकार के पास कई विकल्प खुले हैं:

  1. आंतरिक विभागीय जांच (एसटीएफ/डीआईजी स्तर): विभागीय एडीसी/डीआईजी स्तर की त्वरित जांच करायी जा सकती है।
  2. विशेष जांच टीम/CBI अनुरोध: यदि स्थानीय जांच पर एतराज रहे तो जांच केंद्रीय एजेंसी को सौंपने के सुझाव भी मिल रहे हैं।
  3. निलंबन/अस्थायी स्थानांतरण: जिन अधिकारियों के नाम रिपोर्ट में आएंगे, उन्हें निलंबित कर तुरंत जांच के दायरे में रखा जा सकता है।
  4. वित्तीय ऑडिट: राजस्व हानि, टैक्स और कागजी मैनिपुलेशन की जड़ तक पहुँचने के लिए विस्तृत फाइनेंशियल ऑडिट कराया जा सकता है।

विभाग में उठ रहे प्रमुख प्रश्न

  • क्या टपरी फैक्ट्री के माध्यम से अन्य स्थानों पर भी अवैध सप्लाई की गई थी?
  • किन विचाराधीन अधिकारियों ने अनुमतियाँ जारी कीं और किनके हस्ताक्षर/नियंत्रण में रिकॉर्ड बदला गया?
  • क्या यह एक संगठित गिरोह था जिसमें फैक्ट्री और विभागीय अधिकारी दोनों शामिल थे?
  • कार्मिक अनुभाग में देरी का वास्तविक कारण क्या है — प्रक्रिया या मिलीभगत?

प्रभावित पक्षों की प्रतिक्रिया

  • फैक्ट्री प्रबंधन/आरोपी पक्ष: प्रारंभिक पूछताछ के बाद आरोपियों ने जबावदेही से इंकार किया है और ज्वाइंट स्टेटमेंट की माँग की है; वे अदालत में अपनी सफाई पेश करने का संकेत दे चुके हैं।
  • विभागीय कर्मचारी संगठनों का दबाव: कुछ संघों ने कहा है कि किसी भी निष्कर्ष से पहले सभी तथ्यों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए; वहीं कुछ कर्मचारी नेतृत्‍व ने आंतरिक प्रक्रियाओं की पारदर्शिता की मांग तेज की है।
  • सार्वजनिक/राजनीतिक दबाव: विपक्षी और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों ने कहा है कि यदि पुष्टि हुई तो यह विभागीय स्तर पर बहुत बड़ा भ्रष्‍टाचार है और उच्चस्तरिय जवाबदेही जरूरी है।

क्या जल्द होगा पारदर्शी फैसला?

मंत्री का सख्त रुख और कार्मिक अनुभाग से रिपोर्ट की मांग यह संकेत दे रही है कि मामले को दबाने का कोई प्रयास सफल नहीं होने दिया जाएगा। हालांकि, रिपोर्ट के मिलते ही अगले चरणों की रूपरेखा स्पष्ट होगी — चाहे वह विभागीय सजा हो, दंडात्मक कार्रवाई हो या कानूनी मुकदमों का सिलसिला।


नोट: इस रिपोर्ट में जिन भी तथ्यों का उल्लेख किया गया है वे सरकारी/पुलिसिया प्रवृतियों और विभागीय सूत्रों पर आधारित हैं। जिस भी अधिकारी या पक्ष का नाम आ रहा है, उस पर अब तक आरोप-प्रक्रिया चल रही है; अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया व औपचारिक जांच के उपरांत ही आएगा।

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