
लखनऊ में “ट्रांसफर पोस्टिंग की दुकान” ? आबकारी विभाग पर उठे गंभीर सवाल
उत्तर प्रदेश के उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग में एक बार फिर ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। विभाग के अंदरखाने से निकल रही सूचनाएं यह संकेत दे रही हैं कि इस बार भी स्थानांतरण प्रक्रिया पारदर्शिता से ज्यादा “प्रभाव और पहुंच” के आधार पर संचालित होती दिखाई दे रही है।
सूत्रों के मुताबिक लखनऊ इन दिनों आबकारी विभाग की ट्रांसफर-पोस्टिंग गतिविधियों का अनौपचारिक केंद्र बन गया है। आरोप है कि मुजफ्फरनगर की त्रिवेणी डिस्टलरी में तैनात सहायक आबकारी आयुक्त निरंकार पांडे कथित तौर पर कमिश्नर स्तर से जुड़े ट्रांसफर, पोस्टिंग और सुनवाई प्रकरणों को देख रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि संबंधित अधिकारी लगातार लखनऊ में बैठकर ट्रांसफर-पोस्टिंग और विभागीय मामलों का संचालन कर रहे हैं, तो फिर डिस्टलरी के रोजमर्रा के महत्वपूर्ण कार्य कौन संभाल रहा है? डिस्टलरी में जमा-निकासी, गेट पास और संवेदनशील काउंटर साइनिंग जैसे काम आखिर किसके भरोसे चल रहे हैं? विभागीय हलकों में यह चर्चा तेज है कि क्या डिस्टलरी संचालन को “खुली छूट” दे दी गई है।
अब इस पूरे मामले में एक और गंभीर सवाल उठ रहा है। विभागीय चर्चाओं के अनुसार यदि सहायक आबकारी आयुक्त निरंकार पांडे और मुबारक अली की आधिकारिक CUG मोबाइल लोकेशन न तो उनके मुख्यालय प्रयागराज में मिलती है और न ही उनके वास्तविक तैनाती स्थल पर, बल्कि लगातार लखनऊ में सक्रिय पाई जाती है, तो यह अपने आप में गंभीर प्रशासनिक कदाचार का मामला माना जा सकता है।
ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि क्या अधिकारी अपने अधिकृत कार्यस्थल से बाहर रहकर विभागीय कार्यों को प्रभावित कर रहे हैं? यदि ऐसा है तो यह केवल प्रशासनिक अनुशासन का मामला नहीं बल्कि शासन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न है।
जानकारी यह भी सामने आ रही है कि जिन अधिकारियों को डिस्टलरी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है, वे भी अधिकांश समय लखनऊ में ही सक्रिय बताए जा रहे हैं। जबकि सवाल यह है कि क्या लखनऊ आबकारी विभाग का अधिकृत संचालन मुख्यालय है, जहां से इस प्रकार की समानांतर व्यवस्था चलाई जाए?
दरअसल, आबकारी विभाग की ट्रांसफर-पोस्टिंग प्रक्रिया पिछले कई वर्षों से विवादों में रही है। हर बार स्थानांतरण सूची जारी होने से पहले कथित सेटिंग, पैरवी और आर्थिक लेनदेन की चर्चाएं विभागीय गलियारों में सुनाई देती रही हैं। इस बार भी हालात अलग नजर नहीं आ रहे।
सूत्र बताते हैं कि जल्द ही करीब 14 जिला आबकारी अधिकारियों के तबादले होने हैं, जबकि कम से कम तीन डिप्टी स्तर के अधिकारियों की नई तैनाती भी प्रस्तावित है। ऐसे में विभाग के भीतर खेमेबाजी और लॉबिंग तेज हो गई है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग विवादों से बच पाएगा या फिर “ट्रांसफर पोस्टिंग की दुकान” वाले आरोप और मजबूत होंगे?
फिलहाल विभाग की चुप्पी कई नए सवाल खड़े कर रही है। यदि आरोप निराधार हैं तो सरकार और विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, और यदि शिकायतों में सच्चाई है तो पारदर्शी जांच कर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
आबकारी विभाग में अराजकता की खुलती पोल
सबसे गंभीर सवाल विभागीय मुख्यालय और सरकारी संसाधनों के उपयोग को लेकर उठ रहा है। जब ऑन रिकॉर्ड कमिश्नर और एडिशनल कमिश्नर का अधिकृत मुख्यालय प्रयागराज है और शासन की ओर से उन्हें वहीं सरकारी आवास भी उपलब्ध कराया गया है, तो फिर मुख्यालय से इनोवा गाड़ी में सैकड़ों विभागीय फाइलें लेकर बार-बार लखनऊ क्यों जाया जाता है?
विभागीय सूत्रों के अनुसार प्रयागराज से लखनऊ और लखनऊ से प्रयागराज के बीच लगातार चलने वाली इस सरकारी गाड़ी को लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर इस गाड़ी में कौन-कौन अधिकारी या फाइलें भेजी जाती हैं और किस उद्देश्य से भेजी जाती हैं?
सबसे अहम बात यह है कि सरकारी वाहन, ईंधन और संसाधनों के इस कथित उपयोग पर विभाग में तैनात वित्त नियंत्रक की ओर से अब तक कोई आपत्ति सार्वजनिक रूप से सामने क्यों नहीं आई। जबकि दूसरी ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार फिजूलखर्ची रोकने और सरकारी संसाधनों के नियंत्रित उपयोग की बात करते रहे हैं।
ऐसे में आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। विभागीय हलकों में चर्चा है कि यह पूरा मामला केवल ट्रांसफर-पोस्टिंग तक सीमित नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनुशासन और जवाबदेही के कमजोर पड़ने का संकेत बनता जा रहा है।
“अराजकता की पोल” खुलने का दावा
विभागीय जानकारों का कहना है कि मौजूदा घटनाक्रम आबकारी विभाग के अंदर व्याप्त अराजकता की पोल खोल रहा है। एक तरफ अधिकारियों का मुख्यालय कुछ और है, जबकि वास्तविक गतिविधियां दूसरे शहर से संचालित होने के आरोप लग रहे हैं। दूसरी तरफ ट्रांसफर-पोस्टिंग, सुनवाई, फाइल मूवमेंट और सरकारी संसाधनों के उपयोग को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
यदि इन आरोपों और चर्चाओं में सच्चाई है, तो यह केवल प्रशासनिक अव्यवस्था नहीं बल्कि शासन की पारदर्शिता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न माना जाएगा।
नोट: यह खबर विभागीय सूत्रों और प्राप्त सूचनाओं पर आधारित है। अवध भूमि न्यूज़ स्वतंत्र रूप से सभी आरोपों की पुष्टि नहीं करता किंतु इनोवा गाड़ी सैकड़ो फाइल लेकर लखनऊ में कहां जाती है और जी तथा कथित कैंप कार्यालय पर एडिशनल कमिश्नर और कमिश्नर निवास करते हैं क्या उसकी शासन से कोई मंजूरी मिली है जैसे तमाम यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब आना बाकी है।




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