
लखनऊ। उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग में निरीक्षकों के ऑनलाइन तबादला प्रक्रिया को लेकर अब बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। लंबे इंतजार और भारी दबाव के बाद जैसे ही ट्रांसफर पोर्टल खोला गया, वैसे ही विभागीय कर्मचारियों के बीच नए सवाल खड़े हो गए। आरोप है कि जिन निरीक्षकों का एक ही सर्किल में तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा हो चुका है, उन्हें विकल्प के रूप में कई महत्वपूर्ण सर्किल दिखाई ही नहीं दे रहे हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा एटा जनपद की एक सर्किल को लेकर हो रही है, जहां संबंधित सर्किल कई पात्र निरीक्षकों के पोर्टल पर विकल्प के रूप में खुल ही नहीं रही। हैरानी की बात यह है कि ऐसी शिकायतें केवल एक जिले तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कई अन्य जनपदों से भी इसी तरह की बातें सामने आ रही हैं।
अब विभाग के भीतर यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर यह तकनीकी गड़बड़ी है या सुनियोजित खेल? सवाल उठ रहे हैं कि क्या कार्मिक शाखा द्वारा जानबूझकर सही फीडिंग नहीं की गई, क्या टास्क फोर्स स्तर पर किसी प्रकार की सेटिंग की गई, या फिर कमिश्नर कार्यालय के दबाव में कुछ सर्किलों को “लॉक” किया गया है?
सूत्रों का कहना है कि ऑनलाइन ट्रांसफर प्रणाली इसलिए लागू की गई थी ताकि तबादलों में पारदर्शिता आए, मनमानी खत्म हो और सभी निरीक्षकों को समान अवसर मिल सके। लेकिन अब जिस तरह से चयन के विकल्प सीमित दिखाई दे रहे हैं, उससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
कई निरीक्षक खुलकर यह कह रहे हैं कि यदि पात्र अधिकारियों को उनकी पसंद या उपलब्ध रिक्त सर्किलें ही नहीं दिखाई जाएंगी, तो ऑनलाइन ट्रांसफर केवल दिखावा बनकर रह जाएगा। विभागीय गलियारों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि “मनपसंद पोस्टिंग” बचाने और कुछ खास लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए डिजिटल सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है।
मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ लिया है क्योंकि पहले ही ऑफलाइन तबादलों को लेकर शासनादेश उल्लंघन के आरोप लग चुके हैं। ऐसे में ऑनलाइन पोर्टल में कथित छेड़छाड़ या विकल्प सीमित करने की शिकायतें पूरे ट्रांसफर सिस्टम की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा रही हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि ऑनलाइन प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है, तो फिर कई सर्किल पात्र निरीक्षकों के पोर्टल पर क्यों नहीं खुल रही हैं? क्या शासन इस पूरे मामले की तकनीकी जांच कराएगा? क्या यह केवल “सॉफ्टवेयर एरर” है या फिर पर्दे के पीछे कोई बड़ा खेल चल रहा है?
आबकारी विभाग के भीतर उठ रहे ये सवाल अब प्रशासनिक हलकों में भी चर्चा का विषय बन गए हैं। यदि समय रहते स्थिति स्पष्ट नहीं की गई, तो ऑनलाइन ट्रांसफर प्रक्रिया पर भरोसा पूरी तरह टूट सकता है।




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