
विकल्पों की अनदेखी, मनमाना स्थानांतरण और वर्षों से जमे कर्मचारियों का खेल! प्रतापगढ़ के विकास भवन में आखिर चल क्या रहा है?
प्रतापगढ़। शासन ने स्पष्ट व्यवस्था बनाई है कि तीन वर्ष की सेवा पूर्ण कर चुके ग्राम विकास अधिकारियों से उनकी पसंद के पांच विकास खंडों के विकल्प लिए जाएं और स्थानांतरण उन्हीं विकल्पों के आधार पर किया जाए। लेकिन प्रतापगढ़ में जारी हालिया स्थानांतरण आदेशों ने इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दस्तावेजों के अध्ययन से सामने आया है कि ग्राम विकास अधिकारी आत्माराम मौर्य और संजय कुमार जायसवाल ने नियमानुसार अपने-अपने पांच विकल्प प्रस्तुत किए थे, लेकिन जिला विकास अधिकारी कार्यालय ने उनके द्वारा दिए गए विकल्पों को दरकिनार करते हुए उन्हें ऐसे विकास खंडों में भेज दिया जो उनकी पसंद की सूची में शामिल ही नहीं थे।
आत्माराम मौर्य के मामले में क्या हुआ?


आत्माराम मौर्य वर्तमान में लालगंज विकास खंड में तैनात थे। उन्होंने स्थानांतरण हेतु जो पांच विकल्प दिए थे, उनमें—
- रामपुर संग्रामगढ़
- लक्ष्मणपुर
- सांगीपुर
- कालाकांकर
- सदर
शामिल थे।
लेकिन जारी आदेश में उनका स्थानांतरण आसपुर देवसरा कर दिया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब आसपुर देवसरा उनके द्वारा दिए गए विकल्पों में था ही नहीं, तो फिर उन्हें वहां किस आधार पर भेजा गया?
संजय कुमार जायसवाल के मामले में भी वही कहानी


संजय कुमार जायसवाल, जो बाबागंज विकास खंड में कार्यरत थे, उन्होंने अपने विकल्पों में—
- कालाकांकर
- रामपुर संग्रामगढ़
- लालगंज
- कुंडा
- लक्ष्मणपुर
का चयन किया था।
लेकिन स्थानांतरण आदेश में उन्हें पट्टी भेज दिया गया।
पट्टी भी उनके विकल्पों में शामिल नहीं था। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि विकल्प केवल औपचारिकता थे तो कर्मचारियों से आवेदन भरवाने का औचित्य क्या था?
फिर विकल्प मांगे ही क्यों गए?
सबसे गंभीर सवाल यही है।
यदि जिला विकास अधिकारी कार्यालय को अपनी मर्जी से ही तैनाती करनी थी तो कर्मचारियों से विकल्प लेने की प्रक्रिया केवल दिखावा बनकर रह जाती है। शासन की मंशा कर्मचारियों की वरीयता और पारदर्शिता को महत्व देने की थी, लेकिन प्रतापगढ़ में जारी आदेशों से यह मंशा ध्वस्त होती दिखाई दे रही है।
कर्मचारियों के बीच चर्चा है कि यदि दो अधिकारियों के साथ ऐसा हुआ है तो अन्य मामलों में भी इसी तरह की मनमानी की जांच होनी चाहिए।
जिम्मेदारी किसकी?
इन आदेशों पर हस्ताक्षर जिला विकास अधिकारी प्रभारी संतोष कुमार सिंह के हैं। इसलिए स्थानांतरण प्रक्रिया में हुई किसी भी अनियमितता की प्राथमिक जवाबदेही उन्हीं पर आती है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि—
- क्या विकल्पों की सूची देखी गई थी?
- क्या किसी सक्षम स्तर से विकल्पों से हटकर तैनाती की अनुमति ली गई?
- यदि ली गई तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
जब तक इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता, तब तक पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में रहेगी।
रणवीर सिंह पटेल पर भी उठ रहे सवाल
विकास भवन में कर्मचारियों के बीच एक और मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। आरोप है कि रणवीर सिंह पटेल, जो मृतक आश्रित कोटे से नियुक्त हुए थे, लगभग 10 वर्षों से जिला विकास अधिकारी कार्यालय में ही जमे हुए हैं।
कर्मचारियों का कहना है कि इतने लंबे समय में न केवल उनकी तैनाती बनी रही बल्कि पटल परिवर्तन (सीट परिवर्तन) तक नहीं किया गया।
प्रशासनिक व्यवस्था में लंबे समय तक एक ही स्थान और एक ही पटल पर तैनाती को सामान्यतः उचित नहीं माना जाता क्योंकि इससे निष्पक्षता और पारदर्शिता पर प्रश्न उठते हैं।
जांच की मांग तेज
अब मांग उठ रही है कि—
- दोनों स्थानांतरण आदेशों की स्वतंत्र जांच कराई जाए।
- विकल्पों से हटकर किए गए स्थानांतरण का आधार सार्वजनिक किया जाए।
- विकास भवन में वर्षों से जमे कर्मचारियों की सूची जारी की जाए।
- एक ही पटल पर लंबे समय से कार्यरत कर्मचारियों के कार्यों की समीक्षा कराई जाए।
बड़ा सवाल
यदि शासन के आदेश, कर्मचारियों के विकल्प और निर्धारित प्रक्रिया सब कुछ मौजूद था, तो फिर आत्माराम मौर्य को आसपुर देवसरा और संजय कुमार जायसवाल को पट्टी किसके निर्देश पर भेजा गया?
जब नियमों की अनदेखी कर मनमाने निर्णय लिए जाएंगे तो कर्मचारियों का व्यवस्था पर विश्वास कैसे कायम रहेगा? प्रतापगढ़ के विकास भवन में उठे ये सवाल अब केवल दो स्थानांतरण आदेशों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि पूरी स्थानांतरण प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न बनकर खड़े हैं।




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