
प्रतापगढ़। लोक निर्माण विभाग (PWD) के प्रांतीय खंड में तैनात जेई अतुल यादव (मैकेनिकल) तथा विभागीय अधिकारियों पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लग रहे हैं। आरोप है कि कई ऐसे ट्रैक्टर, जीप और अन्य वाहन जो लंबे समय से खराब, अनुपयोगी अथवा कार्यहीन पड़े हैं, उनके नाम पर लगातार लाखों रुपये का डीजल और पेट्रोल खर्च दिखाया जा रहा है।
सूत्रों का दावा है कि विभाग के अभिलेखों में जिन वाहनों के लिए नियमित रूप से ईंधन निर्गत किया जा रहा है, उनमें से कई वास्तव में संचालन की स्थिति में ही नहीं हैं। इतना ही नहीं, कुछ विभागीय कर्मचारियों का आरोप है कि राजनीतिक और गैर-विभागीय गतिविधियों में उपयोग हुए ईंधन को भी सरकारी खाते में समायोजित किए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
यदि ये आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं बल्कि सरकारी धन के सुनियोजित दुरुपयोग का बड़ा घोटाला साबित हो सकता है।
क्या है पूरा मामला?
बताया जा रहा है कि विभाग में वर्षों से कुछ पुराने और खराब वाहन रिकॉर्ड में सक्रिय दिखाए जा रहे हैं। इन्हीं वाहनों के नाम पर नियमित रूप से ईंधन निर्गत होता रहा है। आरोप यह भी है कि ईंधन निर्गमन रजिस्टर, वाहन लॉगबुक और वास्तविक वाहन संचालन के बीच भारी अंतर हो सकता है।
विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि पिछले कुछ वर्षों के रिकॉर्ड खंगाले जाएं तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। कुछ कर्मचारी इस कथित घोटाले का आकार लाखों रुपये बताते हैं तो कुछ इसे करोड़ों रुपये तक का खेल मान रहे हैं।
किन जांचों से हो सकता है बड़ा खुलासा?
मामले की निष्पक्ष जांच होने पर निम्न बिंदुओं पर बड़े खुलासे संभव हैं—
1. वाहनों का भौतिक सत्यापन
जिन वाहनों के नाम पर तेल निकला, वे वास्तव में चालू हैं या कबाड़ बन चुके हैं, इसकी जांच।
2. ईंधन निर्गमन रजिस्टर की जांच
किस वाहन को कितना और कितनी बार ईंधन जारी हुआ तथा क्या उसकी वास्तविक आवश्यकता थी।
3. लॉगबुक ऑडिट
वाहनों द्वारा तय की गई दूरी, दौरे और ईंधन खपत का मिलान।
4. पेट्रोल पंप बिलों का सत्यापन
विभागीय भुगतान और पेट्रोल पंप के मूल रिकॉर्ड का मिलान।
5. विशेष वित्तीय ऑडिट
पिछले 3 से 5 वर्षों में ईंधन मद में हुए खर्च का स्वतंत्र ऑडिट।
6. मैकेनिकल शाखा की भूमिका
कौन से वाहन अनुपयोगी थे और फिर भी उनके नाम पर तेल क्यों निकाला गया।
7. GPS एवं तकनीकी रिकॉर्ड की जांच
जहां उपलब्ध हो, वहां वाहन संचालन का वास्तविक डेटा खंगाला जाए।
8. अधिकारियों की जवाबदेही
किस अधिकारी ने ईंधन निर्गमन और भुगतान को स्वीकृति दी।
9. राजनीतिक उपयोग की जांच
क्या सरकारी ईंधन का उपयोग किसी गैर-सरकारी अथवा राजनीतिक गतिविधि में हुआ।
10. विजिलेंस और आर्थिक अपराध जांच
यदि बड़े पैमाने पर सरकारी धन के दुरुपयोग के संकेत मिलते हैं तो सतर्कता एवं आर्थिक अपराध शाखा द्वारा जांच।
क्या-क्या निकल सकता है?
जांच में निम्न प्रकार की अनियमितताएं सामने आने की संभावना जताई जा रही है—
- बंद वाहनों के नाम पर फर्जी तेल खर्च
- फर्जी लॉगबुक और फर्जी दौरा विवरण
- पेट्रोल पंप बिलों में गड़बड़ी
- सरकारी धन का निजी उपयोग
- अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत
- लाखों से करोड़ों रुपये तक की वित्तीय अनियमितता
विशेष ऑडिट की मांग
मामले की गंभीरता को देखते हुए विभागीय कर्मचारियों और स्थानीय लोगों द्वारा विशेष ऑडिट की मांग उठाई जा रही है। मांग है कि सभी वाहनों का भौतिक सत्यापन कराया जाए, पिछले वर्षों के ईंधन खर्च की स्वतंत्र जांच हो तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
यदि शासन स्तर से निष्पक्ष जांच बैठती है तो विभाग के कई वर्षों पुराने रिकॉर्ड खुल सकते हैं और जिम्मेदार लोगों की भूमिका भी सामने आ सकती है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन और विभाग इस गंभीर आरोप पर क्या कदम उठाते हैं।




More Stories
जौनपुर आबकारी विभाग में कथित रिश्वतखोरी का मामला: कोर्ट के आदेश पर निरीक्षक और सिपाही के खिलाफ FIR, अब तत्कालीन डिप्टी एक्साइज कमिश्नर की भूमिका पर भी उठे सवाल
शराब माफिया घोषित हुआ हिस्ट्रीशीटर मनोज जायसवाल, चार सहयोगी भी रडार पर:
अवध भूमि न्यूज़ को दबाव में लेने की कोशिश? फर्जी प्रकरण में फंसाने की कथित साजिश पर उठे सवाल: