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आबकारी विभाग में ट्रांसफर घोटाला! अब इकबाल खान की अर्जी ने खोली तबादला नीति की पोल, कमिश्नर कार्यालय पर गंभीर सवाल:


लखनऊ। उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग की तबादला सूची को लेकर उठ रहे विवाद के बीच अब निरीक्षक इकबाल खान की ओर से आबकारी आयुक्त को दी गई प्रार्थना-पत्र ने पूरे मामले को और अधिक गंभीर बना दिया है। इस पत्र में किए गए दावों ने तबादला प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

इकबाल खान ने अपने आवेदन में बताया है कि उनका स्थानांतरण विधि अनुभाग, मुख्यालय प्रयागराज से किसान कोऑपरेटिव शुगर मिल्स लिमिटेड, बिजनौर कर दिया गया है। उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि वे मुख्यालय के विधि अनुभाग में केवल लगभग 1 वर्ष 6 माह से कार्यरत हैं और इससे पहले कभी मुख्यालय प्रयागराज में नियुक्त नहीं रहे।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इकबाल खान ने अपने आवेदन में उल्लेख किया है कि उनकी सेवानिवृत्ति में मात्र 9 माह शेष हैं। इसके बावजूद उनका स्थानांतरण कर दिया गया, जबकि कई ऐसे कर्मचारी और अधिकारी हैं जो वर्षों से एक ही मंडल या क्षेत्र में जमे हुए हैं और उन्हें नहीं हटाया गया।

विकल्प देने का मौका भी नहीं मिला?

इकबाल खान ने अपने आवेदन में दावा किया है कि 26 मई 2026 से 27 मई 2026 तक मानव संपदा पोर्टल पर स्थानांतरण के लिए विकल्प मांगे गए थे, लेकिन उन्हें इसकी जानकारी ही नहीं थी। उन्होंने कहा है कि यदि उन्हें इसकी जानकारी होती तो वे अपने निकट भविष्य में होने वाली सेवानिवृत्ति का उल्लेख करते हुए स्थानांतरण से छूट अथवा स्थानांतरण न किए जाने का अनुरोध करते।

यानी अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सभी कर्मचारियों को समान रूप से विकल्प भरने का अवसर मिला था या नहीं?

अमित अग्रवाल बनाम इकबाल खान: दो मानक क्यों?

विभागीय कर्मचारियों के बीच सबसे बड़ी चर्चा इस बात को लेकर है कि एक तरफ आबकारी आयुक्त के निजी सहायक अमित अग्रवाल हैं, जिन्होंने कथित रूप से लगभग दस वर्षों तक प्रयागराज मंडल में रहते हुए कनिष्ठ सहायक, वरिष्ठ सहायक और निरीक्षक तक की पदोन्नति प्राप्त की और फिर भी तबादले से बचे रहे।

दूसरी ओर इकबाल खान हैं, जो मुख्यालय में केवल डेढ़ वर्ष से कार्यरत थे, पहले कभी मुख्यालय में नहीं रहे, सेवानिवृत्ति में मात्र नौ माह शेष हैं, फिर भी उनका स्थानांतरण कर दिया गया।

कर्मचारी पूछ रहे हैं कि यदि तबादले पूरी तरह नीति के अनुसार हुए हैं तो दोनों मामलों में अलग-अलग मापदंड क्यों अपनाए गए?

कमिश्नर कार्यालय पर बढ़ते सवाल

इकबाल खान की अर्जी सामने आने के बाद अब सवाल केवल एक तबादले तक सीमित नहीं रह गया है। कर्मचारियों का कहना है कि यह पूरा प्रकरण दर्शाता है कि तबादला सूची तैयार करते समय सेवा अवधि, सेवानिवृत्ति की स्थिति और कर्मचारियों के विकल्प जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं की अनदेखी की गई।

विभागीय हलकों में चर्चा है कि कई अन्य तबादले भी इसी प्रकार विवादित हैं और यदि पूरी सूची की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो और भी कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।

‘चहेतों को संरक्षण, बाकी पर कार्रवाई’ का आरोप

तबादला सूची के बाद विभाग में यह धारणा मजबूत हो रही है कि कुछ प्रभावशाली और मुख्यालय से जुड़े लोगों को बचाने के लिए नियमों को दरकिनार किया गया। अमित अग्रवाल और इकबाल खान का मामला अब इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आ रहा है।

आबकारी विभाग की तबादला सूची अब केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि विभाग में पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही पर उठे गंभीर सवालों का प्रतीक बनती जा रही है। कर्मचारियों की मांग है कि पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि तबादलों में वास्तव में नीति लागू हुई या फिर प्रभावशाली लोगों के लिए अलग नियम बनाए गए।

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