
जिले में ट्रांसफर सीजन शुरू होने से पहले ही बड़ा खेल सामने आ रहा है। प्रभारी डीडीओ संतोष सिंह एक बार फिर चर्चाओं में हैं और इस बार मामला कई संदिग्ध ट्रांसफर, वसूली और पुराने आरोपियों की पुनः तैनाती से जुड़ा बताया जा रहा है।
गबन के आरोपी को फिर मिली तैनाती!
ग्राम विकास अधिकारी वीरेंद्र प्रताप सरोज, जिन पर पहले गबन का मामला दर्ज हुआ था और रिकवरी भी हो चुकी थी, उन्हें फिर से “मलाइदार” पोस्टिंग बाबा बेलखरनाथ धाम क्षेत्र में दे दी गई। यह फैसला गंभीर सवाल खड़े करता है कि क्या नियमों की अनदेखी कर मनचाही तैनाती दी जा रही है?
ट्रांसफर के नाम पर वसूली का बड़ा आरोप
सूत्रों के मुताबिक, ट्रांसफर सीजन शुरू होने से पहले ही करीब 4 संदिग्ध ट्रांसफर किए जा चुके हैं। आरोप है कि इन ट्रांसफरों में मांगी गई रकम की वसूली की गई है और पूरा मामला एक संगठित नेटवर्क के तहत संचालित हो रहा है।
नए नाम जुड़े—ट्रांसफर भी सवालों के घेरे में
अब इस कथित खेल में दो और ग्राम विकास अधिकारियों के नाम सामने आए हैं—
अरविंद सरोज: सांगीपुरब्लॉक से कुंडा ट्रांसफर
फरीद अंसारी: सांडवा चंद्रिका से उनके गृह ब्लॉक बेलखरनाथ धाम (BBND) ट्रांसफर
आरोप है कि इन दोनों ट्रांसफरों को भी ट्रांसफर सीजन से पहले ही मोटी रकम लेकर कराया गया।
️♂️ स्टेनो पर ‘संगठित वसूली नेटवर्क’ का आरोप
जिला विकास अधिकारी कार्यालय का एक चर्चित स्टेनो, जो लगभग एक दशक से एक ही पटल पर तैनात है, पूरे नेटवर्क का अहम किरदार बताया जा रहा है। जानकारी मिली है कि यह स्टेनो संगठित रूप से ग्राम विकास अधिकारियों के ट्रांसफर के लिए वसूली कर रहा है और “सेटिंग” के जरिए सौदे तय किए जा रहे हैं।
रेट लिस्ट भी तय—पोस्टिंग का ‘रेट कार्ड’ की जोरदार चर्चा:
एक ट्रांसफर की कीमत: ₹1 लाख से ₹2 लाख
संभावित ट्रांसफर: 50 से 60 ग्राम विकास अधिकारी
रेट तय: क्लस्टर के आधार पर
अगर इन आंकड़ों को जोड़ा जाए, तो पूरे खेल में लाखों रुपये के लेन-देन की आशंका जताई जा रही है।
⚠️ सबसे बड़े सवाल
क्या ट्रांसफर अब “नीलामी” का जरिया बन चुका है?
क्या जिम्मेदार अधिकारी इस पूरे नेटवर्क से वाकिफ हैं या सब कुछ उनकी जानकारी में हो रहा है?
क्या गबन के आरोपियों को फिर से वहीं तैनाती देना नियमों के खिलाफ नहीं है?
क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी?
निष्कर्ष
अगर ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक सिस्टम पर गंभीर सवाल है। ट्रांसफर सीजन शुरू होने से पहले ही जिस तरह से “सेटिंग और वसूली” की चर्चा है, वह शासन-प्रशासन की साख पर बड़ा धब्बा है।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि प्रशासन इस मामले में कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
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