
लखनऊ। आबकारी विभाग की साप्ताहिक समीक्षा बैठक उस समय गरमा गई जब सीतापुर की खांडसारी इकाई से कानपुर की कामधेनु पशु आहार यूनिट के लिए रवाना हुए 7 टैंकर शीरे की गंतव्य पर रिसीविंग न होने का मामला सामने आया। यह प्रकरण अब सिर्फ टैंकर गायब होने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि डिजिटल लॉक कहां खुला, टैंकर कहां अनलोड हुए और सिस्टम किस स्तर पर फेल हुआ—इन सवालों ने पूरे विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
डिजिटल लॉक: सबसे अहम कड़ी, लेकिन जवाब नदारद
सूत्रों के मुताबिक हर शीरा टैंकर में डिजिटल लॉक और ट्रैक-एंड-ट्रेस सिस्टम अनिवार्य है। नियमों के अनुसार:
डिजिटल लॉक केवल अधिकृत गंतव्य (पशु आहार यूनिट) पर ही खुल सकता है
लॉक खुलने का लोकेशन, समय और यूनिक लॉग सिस्टम में दर्ज होता है
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि
इन 7 टैंकरों का डिजिटल लॉक आखिर कहां खुला?
यदि कानपुर यूनिट पर नहीं खुला, तो मोलासेस आखिर कहां अनलोड हुआ?
हैरानी की बात यह है कि डिप्टी एक्ससाइज कमिश्नर राकेश सिंह के मुआइने में शीरा गंतव्य तक न पहुंचने का तथ्य तो दर्ज है, लेकिन डिजिटल लॉक खुलने की लोकेशन और अनलोडिंग पॉइंट पर रिपोर्ट खामोश है।
यही खामोशी अब सवालों के घेरे में है।
मुआइना रिपोर्ट अधूरी क्यों?
सूत्र पूछ रहे हैं कि जब:
रवानगी दर्ज है
रिसीविंग नहीं मिली
डिजिटल सिस्टम मौजूद है
तो फिर डिप्टी के मुआइने में यह स्पष्ट क्यों नहीं किया गया कि:
डिजिटल लॉक कहां एक्टिवेट/डी-एक्टिवेट हुआ
किस स्थान पर टैंकर खाली हुआ
क्या यह तकनीकी चूक है या जानबूझकर छोड़ा गया खाली स्थान, इस पर विभाग में चर्चाएं तेज हैं।
ईआईबी और ज्वाइंट एक्ससाइज कमिश्नर की भूमिका पर सवाल:
इस पूरे प्रकरण में ईआईबी (Excise Intelligence Bureau) की भूमिका भी सवालों में है।
डिप्टी स्तर पर मामला पकड़े जाने के बाद:
क्या मुआइना रिपोर्ट प्रभारी ज्वाइंट एक्ससाइज कमिश्नर (ईआईबी) दिलीपमणि त्रिपाठी को सौंपी गई?
यदि सौंपी गई, तो डिजिटल डेटा एनालिसिस और फील्ड वेरिफिकेशन क्यों नहीं कराया गया?
सूत्र यह सवाल भी उठा रहे हैं कि
लखनऊ में पूर्णकालिक ज्वाइंट एक्ससाइज कमिश्नर की नियुक्ति न होना और
प्रभारी व्यवस्था के भरोसे विभाग चलना
क्या ऐसे मामलों को बढ़ावा दे रहा है?
‘प्रभारी सिस्टम’ और ट्रैक रिकॉर्ड पर उठती उंगलियां
विभागीय गलियारों में यह चर्चा भी है कि प्रभारी ज्वाइंट एक्ससाइज कमिश्नर (ईआईबी) का
➡️ भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई का ट्रैक रिकॉर्ड कमजोर रहा है,
जिसका नतीजा यह है कि
फील्ड से आई गंभीर रिपोर्ट्स पर निर्णायक कार्रवाई नहीं हो पाती
जांच आधे रास्ते में ठहर जाती है
हालांकि यह बातें सूत्रों और विभागीय चर्चाओं पर आधारित हैं, लेकिन लगातार सामने आ रहे मामलों ने इन सवालों को और धार दी है।
पशु आहार यूनिट की चुप्पी भी संदिग्ध
नियम साफ कहते हैं कि:
यदि शीरा निर्धारित समय पर नहीं पहुंचता, तो
उपभोक्ता यूनिट को लिखित सूचना देना अनिवार्य है
लेकिन इस मामले में:
न तो लिखित शिकायत सामने आई
न ही किसी प्रकार की अलर्ट रिपोर्ट
जिससे यह सवाल उठता है कि
क्या यूनिट को पहले से पता था कि शीरा कहां उतरेगा?
कमिश्नर स्तर पर कार्रवाई क्यों नहीं?
चूंकि:
6 लाख कुंतल का कोटा
कमिश्नर स्तर से आवंटन
तो रिसीविंग न मिलने पर:
आवंटन तत्काल निलंबित क्यों नहीं हुआ?
रिकवरी और पेनल्टी की प्रक्रिया क्यों नहीं शुरू की गई?
प्रमुख सचिव की सख्ती, सिस्टम सुधार की उम्मीद
इन तमाम सवालों के बीच यह स्पष्ट है कि प्रमुख सचिव आबकारी की जीरो टॉलरेंस नीति की वजह से ही यह मामला साप्ताहिक समीक्षा बैठक में खुलकर सामने आया।
डिजिटल सिस्टम, ईआईबी और फील्ड अफसरों की भूमिका पर खुले मंच पर चर्चा होना इस बात का संकेत है कि
➡️ ऊपर से दबाव है,
➡️ और अब नीचे जवाबदेही तय करनी होगी।
निष्कर्ष
यह मामला सिर्फ 7 टैंकरों का नहीं, बल्कि:
डिजिटल लॉक की विश्वसनीयता,
प्रभारी सिस्टम की कमजोरी,
और शीरा चोरी के संगठित पैटर्न का है।
अब निगाह इस पर है कि:
डिजिटल लॉक का डेटा सार्वजनिक होता है या नहीं
अनलोडिंग पॉइंट की पहचान होती है या नहीं
और क्या जिम्मेदार अफसरों पर वास्तविक कार्रवाई होती है या मामला फाइलों में दब जाता है।
**अगर डिजिटल लॉक बोल पड़ा, तो पूरा खेल खुद-ब-खुद सामने आ जायेगा।
प्रमुख सचिव का अभियान रंग लाया:
करीब महीने भर से प्रमुख सचिव ऐसी ही अवैध गतिविधियों को मॉनिटर कर रही थी और आखिरकार मोलासेस चोरी का एक बड़ा पैटर्न सामने आ गया। सबसे बड़ा सवाल यही है कि उनके स्तर से निर्णायक कार्रवाई होगी या छोटी मछलियां ही शिकार होगी। कार्रवाई का ट्रैक रिकॉर्ड निराश करता है टपरी शराब कांड के कई मास्टरमाइंड पर अब तक कार्रवाई नहीं हुई है जबकि स्टार लाइट ब्रुकेम डिस्टिलरी नवाबगंज गोंडा में करोड़ो रूपये के इथेनॉल चोरीके मामले में मंत्री की सख्ती से डिस्टलरी के एक सहायक आबकारी आयुक्त तो बर्खास्त हो गए लेकिन 58 हजार लीटर इथेनॉल की ऑफलाइन परमिट जारी कर चोरी की नींव तैयार करने वाले तत्कालीन डिप्टी देवीपाटन मंडल दिलीपमणि को इस चोरी का इनाम मिला और वह मेरठ और लखनऊ क्षेत्र का ज्वाइंट बने हुए हैं और भ्रष्टाचार के विरुद्ध शासन की जीरो पालिसी का मजाक बना रहे हैं।




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