
वित्तीय वर्ष बदल गया, हिसाब गायब—कितना पैसा आया, कहां खर्च हुआ, किसे ठेका मिला कुछ स्पष्ट नहीं; डीपीआरओ के नजदीकी सप्लायरों पर मिलीभगत के आरोप:
वित्तीय वर्ष 2025–26 समाप्त हो चुका है और नया वित्तीय वर्ष 2026–27 शुरू हो गया है, लेकिन प्रतापगढ़ में डिजिटल ग्राम लाइब्रेरी योजना का पूरा लेखा-जोखा अब भी अस्पष्ट बना हुआ है। शासन की गाइडलाइन के अनुसार इस योजना में प्रति ग्राम पंचायत लगभग ₹4 लाख खर्च करने का प्रावधान था, लेकिन जमीनी स्तर पर न तो इस धनराशि के उपयोग का स्पष्ट ब्योरा है और न ही खरीद प्रक्रिया पारदर्शी दिख रही है।
सबसे बड़ा सवाल: पैसा आया कितना, खर्च हुआ कहां?
जब प्रति ग्राम पंचायत ₹4 लाख का बजट तय था, तब:
जिले में कुल कितनी पंचायतों को धनराशि मिली?
कुल कितनी राशि रिलीज हुई?
वास्तव में कितना खर्च हुआ?
इन बुनियादी सवालों पर अब तक कोई स्पष्ट आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
टेंडर प्रक्रिया: अब भी रहस्य
गाइडलाइन में GeM पोर्टल के माध्यम से खरीद की बात कही गई थी, लेकिन:
टेंडर कब जारी हुआ?
कितनी कंपनियों ने भाग लिया?
किसे सप्लाई का काम मिला और किस आधार पर?
यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं दिख रही, जिससे संदेह और गहरा हो गया है।
“करीबी फर्मों” को फायदा?
सूत्रों के अनुसार:
सप्लाई का काम सीमित फर्मों को ही दिया गया
ये फर्में कथित तौर पर डीपीआरओ के नजदीकी लोगों से जुड़ी हुई हैं
यदि यह आरोप सही है, तो यह सीधा-सीधा पक्षपात और सेटिंग का मामला बनता है।
डीपीआरओ ऑफिस के अंदर का खेल
इस पूरे मामले में:
पटल सहायक – फाइलों का नियंत्रण
अकाउंटेंट – भुगतान पास करने की भूमिका
डीपीआरओ – अंतिम स्वीकृति
तीनों स्तर मिलकर पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित करते दिख रहे हैं, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
जीएसटी का बड़ा सवाल
दस्तावेजों से संकेत मिलता है कि:
सप्लायर फर्मों ने जीएसटी वसूला
लेकिन यह राशि वास्तव में सरकार तक पहुंची या नहीं, इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं
इससे जीएसटी चोरी की आशंका और मजबूत होती है।
निरीक्षण प्रक्रिया भी संदेह में
Pre Dispatch Inspection (PDI)
Post Delivery Inspection
दोनों की जिम्मेदारी भी जिला स्तर पर ही रही
यानी: खुद खरीद, खुद जांच, खुद भुगतान—पूरी प्रक्रिया एक ही सिस्टम में सिमटी रही
ग्राउंड रियलिटी बनाम कागजी दावे
ग्रामीण क्षेत्रों में सवाल उठ रहे हैं:
क्या वास्तव में सभी पंचायतों में लाइब्रेरी स्थापित हुई?
क्या उपकरण सही गुणवत्ता के हैं?
या सिर्फ कागजों में ही खर्च दिखाया गया?
निष्कर्ष: “₹4 लाख प्रति पंचायत—लेकिन हिसाब शून्य?”
डिजिटल लाइब्रेरी योजना का उद्देश्य भले ही अच्छा रहा हो, लेकिन प्रतापगढ़ में इसके क्रियान्वयन ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
बड़ा बजट—लेकिन कोई स्पष्ट डेटा नहीं
खरीद—लेकिन पारदर्शिता नहीं
जीएसटी—लेकिन जमा होने का प्रमाण नहीं
और सप्लायर—कथित तौर पर “अपने”
जांच की मांग
अब जरूरी है:
पूरे मामले की वित्तीय ऑडिट
सप्लायर फर्मों की जीएसटी जांच
टेंडर प्रक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा
डीपीआरओ कार्यालय की भूमिका की उच्च स्तरीय जांच
अंतिम सवाल:
“अगर प्रति पंचायत ₹4 लाख खर्च हुए, तो उसका पूरा हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं?”
“और अगर सब कुछ नियम से हुआ, तो पारदर्शिता से डर किस बात का?”
यह मामला अब सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि जनता के पैसे और सिस्टम की जवाबदेही का सवाल बन चुका है।




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