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शासन और आबकारी मुख्यालय में प्रतिशपथ पत्र दाखिल करने में बड़ा खेल?

लखनऊ/प्रयागराज। आबकारी विभाग से जुड़े न्यायिक मामलों में प्रतिशपथ पत्र (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। विभाग के विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि शासन के संबंधित अनुभाग, आबकारी मुख्यालय और न्यायालयी मामलों से जुड़े कुछ लोगों के बीच कथित सांठगांठ के माध्यम से एक ऐसी व्यवस्था विकसित हो गई है, जिसमें प्रतिशपथ पत्र समय पर दाखिल कराने के लिए कथित रूप से धन उगाही की जा रही है।

सूत्रों के अनुसार, ट्रिब्यूनल और इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित मामलों में प्रतिशपथ पत्र दाखिल कराने का एक “रेट” तय होने की चर्चा विभागीय गलियारों में आम है। आरोप है कि जो कर्मचारी कथित रूप से प्रति वाद लगभग 20 हजार रुपये का भुगतान कर देता है, उसके मामले में प्रतिशपथ पत्र समय से या निर्धारित समय सीमा से पहले दाखिल करा दिया जाता है। वहीं जो कर्मचारी भुगतान नहीं कर पाते, उनके मामलों में प्रतिशपथ पत्र दाखिल होने में अनावश्यक विलंब होता है।

विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि प्रमुख सचिव एवं आबकारी आयुक्त मासिक समीक्षा बैठकों में यह जांच कर लें कि न्यायालयों में कितने मामलों में समय पर प्रतिशपथ पत्र दाखिल हुए और कितने मामलों में नहीं, तो पूरी तस्वीर स्वतः स्पष्ट हो सकती है। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर किन कारणों से कुछ मामलों में प्रतिशपथ पत्र तेजी से दाखिल हो जाते हैं जबकि अन्य मामलों में महीनों तक लंबित रहते हैं।

सूत्रों ने एक आबकारी निरीक्षक के मामले का हवाला देते हुए दावा किया कि उसका प्रतिशपथ पत्र समय पर दाखिल हुआ और लगभग 11 माह के भीतर उसका मामला निस्तारित भी हो गया। वहीं कई अन्य कर्मचारी ऐसे बताए जा रहे हैं जिनके मामलों में प्रतिशपथ पत्र दाखिल न होने या विलंब से दाखिल होने के कारण न्यायिक प्रक्रिया बाधित हो रही है। यही स्थिति हाईकोर्ट में लंबित मामलों में भी देखने को मिल रही है।

कर्मचारियों का आरोप है कि एक ओर उनके खिलाफ लंबी विभागीय अनुशासनिक कार्यवाहियां चलाई जा रही हैं, दूसरी ओर न्यायिक राहत प्राप्त करने की प्रक्रिया को भी जटिल बनाया जा रहा है। इससे उनकी पदोन्नति, वेतन संबंधी देयताएं और अन्य सेवा लाभ लंबे समय तक अटके रहते हैं। आरोप यह भी है कि इस पूरी व्यवस्था का उद्देश्य उत्पीड़ित कर्मचारियों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बनाना है।

विभाग के अंदर यह चर्चा भी तेज है कि जिन कर्मचारियों की फाइलें और पदोन्नति वर्षों से लंबित हैं, वे न्यायालयों के माध्यम से राहत पाने का प्रयास करते हैं, लेकिन प्रतिशपथ पत्र दाखिल करने में होने वाली देरी उनके मामलों को और लंबा खींच देती है। इससे न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और प्रशासनिक पारदर्शिता दोनों पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। यह सभी मामले  डिप्टी कार्मिक के अधीन हैं।

सूत्रों के अनुसार विभाग के भीतर यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि एक वरिष्ठ स्तर के अधिकारी जो इसी माह के अंत में रिटायर होने वाले हैं के पुत्र, जो ट्रिब्यूनल में विभागीय मामलों की पैरवी से जुड़े बताए जाते हैं, उनके माध्यम से संचालित या निगरानी वाले मामलों में प्रतिशपथ पत्र अपेक्षाकृत तेजी से दाखिल हो जाते हैं। यह कर्मचारियों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि जिन मामलों में प्रतिशपथ पत्र दाखिल करने में महीनों का विलंब होता है, वहीं कुछ मामलों में पूरी प्रक्रिया असामान्य रूप से तेज कैसे हो जाती है। विभागीय हलकों में इस कथित असमानता को लेकर पारदर्शिता और निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं। यदि शासन स्तर पर लंबित मामलों तथा प्रतिशपथ पत्र दाखिल होने की समय-सीमा का तुलनात्मक परीक्षण कराया जाए, तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।

अब देखना यह होगा कि शासन और आबकारी विभाग इन आरोपों को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या इस कथित खेल की निष्पक्ष जांच कराकर जिम्मेदार लोगों की पहचान की जाती है या नहीं।

“होत न आज्ञा बिनु पैसा रे” — विभागीय कर्मचारियों के बीच यह कहावत इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है।

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