
लखनऊ। आबकारी विभाग से जुड़े ट्रिब्यूनल मामलों में कथित अनियमितताओं और लापरवाही को लेकर शासन ने कड़ा रुख अपनाया है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, आबकारी विभाग के प्रमुख सचिव ने ट्रिब्यूनल में लंबित मामलों का विस्तृत विवरण तलब किया है, जिसके बाद आबकारी मुख्यालय के कार्मिक अनुभाग में हड़कंप की स्थिति बताई जा रही है।
सूत्रों का कहना है कि लंबे समय से ट्रिब्यूनल में विचाराधीन कई मामलों में समय पर प्रति शपथ पत्र (काउंटर एफिडेविट) दाखिल नहीं किए गए। इसके कारण विभाग के अनेक अधिकारियों और कर्मचारियों की पदोन्नति तथा सेवा संबंधी मामलों का निस्तारण प्रभावित हुआ। शासन द्वारा अब ऐसे सभी मामलों की समीक्षा कराई जा रही है।
बताया जा रहा है कि ट्रिब्यूनल से जुड़े मामलों के संचालन में बरती गई कथित अनियमितताओं, देरी और प्रशासनिक अराजकता को लेकर प्रमुख सचिव ने गंभीरता दिखाई है। इसी क्रम में लंबित मामलों का पूरा ब्योरा मांगा गया है, जिससे संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जा सके।
विभागीय गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि आखिर किन परिस्थितियों और किसके संरक्षण में मुख्यालय स्तर पर यह व्यवस्था लंबे समय तक चलती रही। इस पूरे प्रकरण में कार्मिक अनुभाग से जुड़े कई अधिकारी और कर्मचारी सवालों के घेरे में बताए जा रहे हैं। चर्चा यह भी है कि पूर्व में कार्मिक कार्य देख चुके कुछ अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी विभाग के भीतर सवाल उठ रहे हैं।
शासन की सक्रियता के बाद उन कर्मचारियों और अधिकारियों में उम्मीद जगी है, जिनके सेवा संबंधी मामले लंबे समय से ट्रिब्यूनल में लंबित पड़े हैं। विभाग के विभिन्न स्तरों पर प्रमुख सचिव के इस कदम का स्वागत किया जा रहा है और इसे पारदर्शिता तथा जवाबदेही की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
उधर, विभाग में सक्रिय बताए जाने वाले कथित बिचौलियों और कार्मिक मामलों में प्रभाव रखने वाले तत्वों के बीच भी इस कार्रवाई को लेकर बेचैनी देखी जा रही है। माना जा रहा है कि यदि लंबित मामलों की निष्पक्ष समीक्षा हुई तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।
अवध भूमि न्यूज़ द्वारा इसी हफ्ते ट्रिब्यूनल मामलों में हो रही देरी, कार्मिक अनुभाग की कार्यप्रणाली और इससे प्रभावित हो रहे कर्मचारियों के हितों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया था। शासन द्वारा अब मामले का संज्ञान लिए जाने के बाद विभागीय हलकों में इसे एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।




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