अवधभूमि

हिंदी न्यूज़, हिंदी समाचार

हाईकोर्ट की फटकार: आदेशों का पालन नहीं, बरामदगी का रिकॉर्ड नहीं, फिर भी वर्षों तक कार्रवाई — टपरी घोटाले में आबकारी विभाग पूरी तरह कठघरे में”

“हाईकोर्ट की फटकार: आदेशों का पालन नहीं, बरामदगी का रिकॉर्ड नहीं, फिर भी वर्षों तक कार्रवाई — टपरी घोटाले में आबकारी विभाग पूरी तरह कठघरे में”

“लाइसेंस बहाल करें, नहीं तो अधिकारी खुद कोर्ट में हाजिर हों” — इलाहाबाद हाईकोर्ट

प्रयागराज। उत्तर प्रदेश के चर्चित “टपरी घोटाले” में इलाहाबाद हाईकोर्ट का ताजा आदेश आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर बेहद गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। कोर्ट ने साफ कहा कि विभाग उसके पूर्व आदेशों का पालन “letter and spirit” यानी पूरी भावना और मूल उद्देश्य के साथ नहीं कर पाया। इतना ही नहीं, विभाग अदालत के सामने कथित बरामद शराब और कार्रवाई का ठोस आधार भी प्रभावी तरीके से नहीं रख सका।

हाईकोर्ट की कोर्ट नंबर-7 में न्यायमूर्ति पियूष अग्रवाल की पीठ ने Writ Tax No. 429 of 2026 में सुनवाई करते हुए बेहद अहम टिप्पणियां कीं। याचिका M/S Co-Operative Company Limited द्वारा दाखिल की गई थी, जिसमें राज्य सरकार और आबकारी विभाग की कार्रवाई को चुनौती दी गई।

हाईकोर्ट के आदेश में क्या-क्या कहा गया?

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि यह मामला “तीसरे दौर की लिटिगेशन” तक पहुंच चुका है। यानी पहले भी अदालत ने विभाग को निर्देश दिए थे, लेकिन उनका पालन नहीं हुआ।

कोर्ट ने अपने आदेश में विस्तार से बताया कि:

  • सबसे पहले वर्ष 2021 में Writ Tax No. 378 of 2021 दायर हुई थी।
  • उस मामले में 5 जनवरी 2022 को आदेश पारित कर प्रकरण दोबारा विचार हेतु भेजा गया।
  • लेकिन विभाग ने उस आदेश का पालन सही तरीके से नहीं किया।
  • इसके बाद फिर Writ Tax No. 169 of 2021 दायर हुई।
  • हाईकोर्ट ने 10 अक्टूबर 2025 को दोबारा आदेश देते हुए आबकारी आयुक्त को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ जो भी सामग्री उपयोग की जानी है, उसकी पूरी कॉपी कंपनी को उपलब्ध कराई जाए।

कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में साफ कहा था कि:

  • विभाग 15 दिन के भीतर पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध कराए।
  • याचिकाकर्ता को जवाब देने का अवसर दिया जाए।
  • व्यक्तिगत सुनवाई कर कानून के अनुसार reasoned and speaking order पारित किया जाए।

यानी अदालत ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित करने के स्पष्ट निर्देश दिए थे।

“रिकॉर्ड नहीं दिया तो कार्रवाई स्वतः समाप्त मानी जाएगी”

हाईकोर्ट के पुराने आदेश का सबसे विस्फोटक हिस्सा वह था जिसमें कहा गया था कि यदि विभाग याचिकाकर्ता को प्रस्तावित सामग्री उपलब्ध नहीं कराता, तो पूरी कार्यवाही “deemed to be dropped” यानी स्वतः समाप्त मानी जाएगी।

यही वह लाइन है जिसने पूरे मामले को पलट दिया है।

अब सवाल उठ रहा है कि जब विभाग आवश्यक रिकॉर्ड और सामग्री ही उपलब्ध नहीं करा पाया, तो फिर वर्षों तक कार्रवाई किस आधार पर जारी रखी गई?

सुप्रीम कोर्ट तक गया मामला, फिर भी विभाग नहीं माना

हाईकोर्ट के आदेश में यह भी दर्ज है कि विभाग ने बाद में संशोधन आवेदन दायर किया, जिसे 23 मार्च 2026 को लागत के साथ खारिज कर दिया गया। इसके खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट तक गई, लेकिन वहां भी Special Leave Petition खारिज हो गई।

इसके बावजूद अदालत ने माना कि:

  • याचिकाकर्ता को अब तक अपना यूनिट चलाने की अनुमति नहीं दी गई।
  • एक्साइज लाइसेंस बहाल नहीं किया गया।

यानी सुप्रीम कोर्ट तक से राहत मिलने के बाद भी विभाग अपने पुराने रुख पर अड़ा रहा।

कोर्ट में विभाग की सबसे बड़ी कमजोरी उजागर

सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से उपस्थित Additional Advocate General अमित सक्सेना भी इस तथ्य का खंडन नहीं कर सके कि आज तक लाइसेंस बहाल नहीं हुआ।

यही वह बिंदु है जिसने आबकारी विभाग की स्थिति अदालत में बेहद कमजोर कर दी।

सूत्रों का कहना है कि विभाग कथित सीज गोदाम से जब्त शराब की वास्तविक बरामदगी और उससे जुड़े दस्तावेज अदालत के सामने प्रभावी तरीके से प्रस्तुत नहीं कर पाया। यही कारण है कि अब पूरी कार्रवाई की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।

एसआईटी रिपोर्ट पर भी उठे सवाल

मामले में गठित एसआईटी को लेकर भी बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। जानकारी के अनुसार इस एसआईटी में वर्तमान अपर मुख्य सचिव संजय प्रसाद, पूर्व अपर मुख्य सचिव आबकारी संजय भूस रेड्डी और तत्कालीन डीजीपी स्तर के अधिकारी शामिल थे।

लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी उच्चस्तरीय जांच रिपोर्ट को विभाग ने अदालत में निर्णायक तरीके से प्रस्तुत नहीं किया।

अब सवाल उठ रहा है:

  • क्या एसआईटी रिपोर्ट विभागीय कार्रवाई के खिलाफ थी?
  • क्या जानबूझकर रिपोर्ट को कमजोर किया गया?
  • क्या विभाग शुरू से ही कुछ लोगों को बचाना चाहता था?

जेल गए अधिकारी, पेंशन जब्त — अब जिम्मेदार कौन?

इसी प्रकरण में:

  • एक डिप्टी स्तर के अधिकारी को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया,
  • कई आबकारी इंस्पेक्टर जेल गए,
  • निलंबन की कार्रवाइयां हुईं,
  • एक सहायक आबकारी आयुक्त की पेंशन तक जब्त कर ली गई।

अब जब अदालत में विभाग अपनी कार्रवाई का आधार तक मजबूती से नहीं रख पा रहा, तब यह सवाल और गंभीर हो गया है कि इन अधिकारियों की प्रतिष्ठा और करियर बर्बाद होने की जिम्मेदारी कौन लेगा?

क्या करोड़ों का मुआवजा देना पड़ेगा?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पीड़ित अधिकारी अब कोर्ट जाकर गलत कार्रवाई, मानसिक प्रताड़ना और प्रतिष्ठा हानि के लिए मुआवजा मांगते हैं, तो सरकार को करोड़ों रुपये चुकाने पड़ सकते हैं।

ऐसी स्थिति में यह सवाल भी उठेगा कि:

  • क्या तत्कालीन प्रमुख सचिव,
  • आबकारी आयुक्त,
  • और कार्मिक विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों

के खिलाफ एफआईआर दर्ज होगी?

क्या व्यक्तिगत जवाबदेही तय होगी?

“अनेजा को बचाने के लिए विभाग ने किया सरेंडर?”

जानकारों का दावा है कि पूरे मामले में बड़े शराब कारोबारी अनेजा को बचाने के लिए विभाग ने अदालत में बेहद कमजोर काउंटर दाखिल किया। आरोप है कि विभाग ने जानबूझकर ऐसा रुख अपनाया जिससे आरोपी पक्ष को राहत मिल सके।

यदि विभाग वास्तव में गंभीर होता तो:

  • जब्ती रिकॉर्ड,
  • गोदाम सीजिंग दस्तावेज,
  • फॉरेंसिक रिपोर्ट,
  • एसआईटी निष्कर्ष,
  • और कथित अवैध शराब नेटवर्क का पूरा रिकॉर्ड

अदालत में मजबूती से रखा जाता।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

हाईकोर्ट की अंतिम चेतावनी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि यदि अगली तारीख तक लाइसेंस बहाल नहीं किया गया तो सभी संबंधित अधिकारी व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होंगे।

यह टिप्पणी दिखाती है कि अदालत अब विभागीय रवैये से संतुष्ट नहीं है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या “टपरी घोटाला” वास्तव में एक फर्जी और अतिरंजित कार्रवाई थी? क्या निर्दोष अधिकारियों को बलि का बकरा बनाया गया? और क्या पूरे मामले में प्रशासनिक शक्ति का दुरुपयोग हुआ?

फिलहाल हाईकोर्ट का आदेश आबकारी विभाग के लिए सिर्फ कानूनी झटका नहीं बल्कि उसकी कार्यप्रणाली पर बड़ा अविश्वास माना जा रहा है।

About Author