
**इनसाइड स्टोरी: ईएनए घोटाले में नए खेल का खुलासा!
‘रिपोर्टों के फेरबदल में किसे बचाया गया, किसे फँसाया गया?’**
देवीपाटन मंडल की चर्चित ईएनए अनुमति और बहाव/चोरी प्रकरण अब एक नए मोड़ पर है। विभागीय दस्तावेज़ों, अंदरूनी सूत्रों और घटनाओं की टाइमलाइन को खंगालने के बाद ऐसा सामने आ रहा है कि पूरा मामला उतना सीधा नहीं है, जितना पहली नज़र में दिखाया गया।
58000 लीटर ईएनए का ऑफलाइन परमिट—खेल की शुरुआत?
सूत्र बताते हैं कि तत्कालीन डिप्टी एक्साइज कमिश्नर दिलीप कुमार मणि त्रिपाठी द्वारा जारी किया गया ऑफलाइन परमिट इस पूरे विवाद की जड़ माना जा रहा है।
दावा यह है कि:
- यह 58000 लीटर ईएनए का परमिट जारी हुआ,
- लेकिन यह ईएनए कभी भी तारा लाइट डिस्टलरी तक पहुँचा नहीं,
- और बाद की जांचों में इसकी कोई स्पष्ट ट्रैकिंग सामने नहीं आई।
यही वह बिंदु है जहाँ पूरा मामला अचानक बदल जाता है।
दो अलग-अलग रिपोर्ट… और उठते बड़े सवाल
अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि वर्तमान डिप्टी एक्साइज कमिश्नर देविपाटन मंडल आलोक कुमार की ओर से दो अलग–अलग रिपोर्ट शासन को भेजी गईं:
- पहली रिपोर्ट – स्टार लाइट डिस्टलरी की टैंक से 27610 लीटर ईएनए बह गया।
- दूसरी रिपोर्ट – वही ईएनए चोरी हो गया।
दो विरोधाभासी रिपोर्टों ने सवाल खड़े कर दिए—क्या जानकारी अधूरी थी, जांच कमजोर थी या फिर रिपोर्ट तैयार करने में कोई “उद्देश्य” था?
सूत्रों का दावा: क्या यह सब किसी को बचाने के लिए हुआ?
इनसाइड सूत्र दावा करते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम में रिपोर्टों की भूमिका बेहद अहम है।
इन दावों के अनुसार:
- रिपोर्टों का उद्देश्य कथित तौर पर ऑफलाइन परमिट जारी करने की जिम्मेदारी से किसी अधिकारी को बचाना था।
- और सारा ध्यान सहायक आबकारी आयुक्त रामप्रीत चौहान पर केंद्रित कर दिया गया।
- जबकि परमिट जारी करने का निर्णय, सूत्रों के अनुसार, उस अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में आता था जिसने वह परमिट अनुमोदित किया।
इन दावों के कारण अब विभाग में यह चर्चा तेज है कि—क्या जांच का असल निशाना भटका दिया गया?
कमिश्नर की भूमिका पर भी सवाल
इसी मामले में यह भी आरोप/दावा है कि शीर्ष स्तर पर भी कुछ निर्णयों में “बचाव” की झलक दिखाई दी, जिससे प्रश्न उठ रहे हैं कि:
- क्या पूरी चैन ऑफ कमांड को सही जानकारी भेजी गई?
- क्या जांच को किसी विशेष दिशा में मोड़ा गया?
- और क्या विभागीय शीर्ष स्तर पर भी इस मामले में लापरवाही हुई?
सबसे बड़ा सवाल: असली दोषी कौन?
इस प्रकरण की परतें खोलने के बाद सामने आने वाले प्रमुख प्रश्न हैं—
- ऑफलाइन परमिट किस नियम के तहत जारी हुआ?
- वर्तमान और तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर की रिपोर्टों में अंतर क्यों है?
- ईएनए न बहा, न चोरी हुआ—तो गया कहाँ?
- किसे बचाने और किसे फँसाने की कोशिश हुई?
- क्या यह पूरी प्रक्रिया एक बड़े खेल का हिस्सा थी?
इनसाइड स्टोरी का निष्कर्ष
विभाग के कई अधिकारी अब खुलकर यह सवाल उठा रहे हैं कि:
“परमिट देने वाला अधिकारी कहाँ है?
रिपोर्ट बदलने वाला कहाँ है?
और कठोर कार्रवाई केवल उसी पर क्यों हुई जिसने परमिट पर हस्ताक्षर तक नहीं किए?”
यह पूरी इनसाइड स्टोरी बताती है कि ईएनए प्रकरण केवल एक तकनीकी जांच नहीं, बल्कि विभाग के भीतर पावर प्ले, रिपोर्ट मैनिपुलेशन और जिम्मेदारी टालने की सियासत का बड़ा उदाहरण बन चुका है।




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