
मध्यप्रदेश की एक बड़ी शराब कंपनी की STOCK BEER को लेकर उठे सवाल अब केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रह गए हैं। शिकायत में लगाए गए आरोपों ने न केवल बीयर निर्माण प्रक्रिया बल्कि उत्तर प्रदेश तक फैले सप्लाई नेटवर्क, आबकारी व्यवस्था और गुणवत्ता जांच तंत्र पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और आबकारी मामलों के जानकार भुवन तोषनीवाल द्वारा भेजी गई शिकायत में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग से मांग की गई है कि संबंधित कंपनी के उत्पादन, गुणवत्ता परीक्षण और बाजार में सप्लाई की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। शिकायत में दावा किया गया है कि बीयर निर्माण के दौरान कई महत्वपूर्ण गुणवत्ता मानकों की अनदेखी की जा रही है, जिससे उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है।
उत्पादन के आंकड़े क्या बताते हैं?
शिकायत में दिए गए वर्षवार उत्पादन आंकड़े कई सवाल पैदा करते हैं —
- Stok Beer
2023-24 : 107777
2024-25 : 57914
2025-26 : 154943
2026-27 : 534931 (april and may half)
इन आंकड़ों में अचानक उत्पादन बढ़ने और घटने का पैटर्न दिखाई देता है। सवाल यह है कि जब उत्पादन में इतनी तेजी से बदलाव हुआ तो क्या उसी अनुपात में गुणवत्ता जांच और लैब परीक्षण भी बढ़ाए गए? या फिर बाजार की मांग पूरी करने के दबाव में गुणवत्ता नियंत्रण को पीछे छोड़ दिया गया?
विशेषज्ञों के अनुसार बीयर निर्माण केवल अल्कोहल उत्पादन नहीं बल्कि एक नियंत्रित वैज्ञानिक प्रक्रिया होती है। इसमें तापमान, किण्वन, फिल्ट्रेशन, ऑक्सीजन स्तर और माइक्रोबायोलॉजिकल स्थिरता जैसी कई प्रक्रियाओं की लगातार निगरानी करनी होती है। यदि इनमें थोड़ी भी लापरवाही हो तो उत्पाद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
शिकायत में किन बिंदुओं पर उठे सवाल?
शिकायतकर्ता ने जिन बिंदुओं का उल्लेख किया है, वे सीधे उपभोक्ता सुरक्षा से जुड़े हुए हैं —
- निर्माण प्रक्रिया परीक्षण
- फिल्ट्रेशन गुणवत्ता
- सूक्ष्मजीव/बैक्टीरिया जांच
- pH वैल्यू परीक्षण
- Dissolved Oxygen की मात्रा
- माइक्रोबायोलॉजिकल स्थिरता
विशेषज्ञ बताते हैं कि Dissolved Oxygen का स्तर यदि नियंत्रित न हो तो बीयर जल्दी खराब हो सकती है। वहीं माइक्रोबियल संक्रमण होने पर उत्पाद की गुणवत्ता और स्वाद दोनों प्रभावित होते हैं। pH संतुलन बिगड़ने पर स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी पैदा हो सकते हैं।
उत्तर प्रदेश तक फैला नेटवर्क?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस STOCK BEER को लेकर मध्यप्रदेश में शिकायतें उठ रही हैं, वही उत्पाद उत्तर प्रदेश में भी बड़े पैमाने पर बिक रहा है। प्रयागराज, वाराणसी, कानपुर, लखनऊ, गोरखपुर समेत कई जिलों में इस ब्रांड की उपलब्धता की चर्चा है।
अब सवाल यह खड़ा हो रहा है कि आखिर यह सप्लाई किस नेटवर्क के माध्यम से हो रही है? क्या कंपनी का कोई अधिकृत बॉन्ड उत्तर प्रदेश में संचालित है? यदि हां, तो उसकी मॉनिटरिंग कौन कर रहा है?
आबकारी व्यवस्था में बॉन्ड की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। किसी भी राज्य में शराब उत्पादों के भंडारण और वितरण के लिए लाइसेंसी बॉन्ड का उपयोग किया जाता है। यदि किसी उत्पाद की गुणवत्ता को लेकर दूसरे राज्य में सवाल उठ रहे हैं, तो संबंधित राज्य के आबकारी विभाग को स्वतः संज्ञान लेकर जांच करनी चाहिए।
यूपी आबकारी विभाग पर भी सवाल
यही कारण है कि अब उत्तर प्रदेश के आबकारी विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। यदि यह बीयर बड़े पैमाने पर यूपी में बिक रही है तो क्या विभाग ने कभी इसकी गुणवत्ता जांच कराई? क्या किसी लैब रिपोर्ट की समीक्षा की गई? क्या किसी जिले से शिकायतें प्राप्त हुईं?
सूत्रों के अनुसार शराब कारोबार में कई बार उत्पादन और सप्लाई का दबाव इतना बढ़ जाता है कि गुणवत्ता नियंत्रण केवल कागजी प्रक्रिया बनकर रह जाता है। ऐसे में विभागीय निरीक्षण की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि शिकायतें पहले से मौजूद थीं तो जिम्मेदार अधिकारियों ने अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की?
क्या विभाग को जानकारी नहीं थी?
क्या निरीक्षण केवल औपचारिकता बनकर रह गया है?
या फिर कारोबारी और प्रशासनिक गठजोड़ के कारण मामले को नजरअंदाज किया जा रहा है?
स्वास्थ्य पर कितना खतरा?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी अल्कोहलिक उत्पाद में गुणवत्ता मानकों की अनदेखी होती है तो उसके प्रभाव लंबे समय में सामने आते हैं। दूषित या असंतुलित उत्पाद पाचन तंत्र, लीवर और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर असर डाल सकते हैं।
हालांकि शिकायत में अभी किसी मेडिकल रिपोर्ट या लैब टेस्ट का सीधा उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन गुणवत्ता जांच की मांग यह संकेत देती है कि मामला केवल कारोबारी प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं है।
क्या होगी कार्रवाई?
अब निगाहें मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों राज्यों के खाद्य सुरक्षा एवं आबकारी विभागों पर टिकी हैं। यदि दोनों राज्यों की एजेंसियां संयुक्त जांच कराती हैं तो कई बड़े खुलासे हो सकते हैं —
- उत्पादन क्षमता बनाम वास्तविक सप्लाई
- गुणवत्ता जांच रिपोर्ट
- बॉन्ड और वितरण नेटवर्क
- लैब परीक्षण रिकॉर्ड
- स्टॉक और बिक्री का वास्तविक डेटा
यदि जांच निष्पक्ष हुई तो यह मामला केवल एक ब्रांड तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे शराब उद्योग की मॉनिटरिंग व्यवस्था पर सवाल खड़े कर सकता है।
फिलहाल संबंधित कंपनी और विभागीय अधिकारियों की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन जिस तरह शिकायत में तकनीकी बिंदुओं और उत्पादन आंकड़ों का उल्लेख किया गया है, उसने इस पूरे मामले को गंभीर बना दिया है।
अब देखना यह होगा कि सरकारें इस शिकायत को सामान्य पत्राचार मानकर छोड़ देती हैं या फिर उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और आबकारी व्यवस्था की पारदर्शिता को ध्यान में रखते हुए उच्चस्तरीय जांच का आदेश देती हैं।




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