
लखनऊ। उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग में इंस्पेक्टर्स के ऑनलाइन ट्रांसफर को लेकर बड़ा विवाद खड़ा होता दिखाई दे रहा है। विभागीय गलियारों में रिजल्ट जारी होने से पहले ही कई नामों और तैनातियों की चर्चा तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक लखनऊ के सेक्टर-10 में एक महिला इंस्पेक्टर की तैनाती, जौनपुर शहर क्षेत्र में एक महिला इंस्पेक्टर की पोस्टिंग और मथुरा की एक महत्वपूर्ण सर्किल में एक इंस्पेक्टर की तैनाती को लेकर रिजल्ट घोषित होने से पहले ही चर्चाएं शुरू हो गई थीं। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर जब ऑनलाइन ट्रांसफर का परिणाम आधिकारिक रूप से जारी नहीं हुआ था, तब संभावित पोस्टिंग की जानकारी बाहर कैसे पहुंच गई?
विभाग के अंदरखाने में चर्चा है कि इस बार ऑनलाइन ट्रांसफर प्रक्रिया केवल “दिखावे की पारदर्शिता” बनकर रह गई। विशिष्ट सूत्रों का दावा है कि 27 तारीख की रात 12 बजे सभी विकल्प लॉक होने के बाद प्रक्रिया पूरी तरह सील मानी जा रही थी, लेकिन इसके बाद कथित तौर पर पोर्टल को दोबारा अनलॉक कराया गया। आरोप है कि रिजल्ट जारी करने के नाम पर NIC से लॉगिन और पासवर्ड लेकर पोर्टल एक्सेस किया गया और फिर महत्वपूर्ण सर्किलों के लिए भरे गए विकल्पों तथा आवेदनों को अलग से कॉपी-पेस्ट कर देखा गया।
सबसे बड़ा आरोप यह है कि ऑनलाइन ट्रांसफर की मूल आत्मा माने जाने वाले “सिमुलेशन” और “रैंडमाइजेशन” की प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया गया। सामान्यतः ऑनलाइन ट्रांसफर सिस्टम में सॉफ्टवेयर के माध्यम से विकल्पों, मेरिट, पात्रता और रिक्तियों के आधार पर स्वतः आवंटन किया जाता है ताकि मानवीय हस्तक्षेप समाप्त हो सके। लेकिन विभागीय सूत्रों का दावा है कि इस बार महत्वपूर्ण सर्किलों के लिए पहले से आवेदन देखने के बाद “मैनेजमेंट” के आधार पर रिजल्ट तैयार किया गया।
सूत्रों के अनुसार कुछ खास सर्किलों को लेकर इतनी दिलचस्पी दिखाई गई कि पहले यह देखा गया कि किस अधिकारी ने कौन-कौन से विकल्प भरे हैं, फिर उसी आधार पर “सेटिंग” के हिसाब से अंतिम सूची तैयार की गई। यही वजह है कि रिजल्ट से पहले ही कुछ पोस्टिंग्स की चर्चा विभाग में खुलेआम होने लगी थी। इससे पूरे ऑनलाइन सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
आबकारी विभाग में पहले भी ट्रांसफर को लेकर विवाद उठते रहे हैं, लेकिन इस बार मामला इसलिए गंभीर माना जा रहा है क्योंकि पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन और पारदर्शी बताई गई थी। विभागीय कर्मचारी अब पूछ रहे हैं कि यदि पोर्टल लॉक होने के बाद भी डेटा देखा और बदला जा सकता है तो फिर ऑनलाइन ट्रांसफर का क्या औचित्य रह जाता है?
कुछ यूं उड़ाया गया ऑनलाइन ट्रांसफर का मजाक:
स्पाउस ग्राउंड पर होने वाले ट्रांसफर फिर विवादों में है बताया जा रहा है कि पोस्टिंग स्थल से स्पाउस की पोस्टिंग 400 किलोमीटर दूर तक हो रही है ऐसा ही एक मामला मथुरा का सामने आया है जहां स्पाउस मथुरा में है पोस्टिंग मुरादाबाद कर दी गई है जबकि नियम कहते हैं कि स्पाउस पोस्टिंग में अधिकतम 100 किलोमीटर दूरी का ही अंतर होना चाहिए। स्पाउस के बहाने लोग मलाईदार पोस्टिंग पा रहे हैं जिसमें कोई निष्पक्षता और पारदर्शिता नहीं है।
चर्चाओं पर विराम कब?
फिलहाल विभाग में चल रही तरह-तरह की चर्चाओं, अटकलों और आरोपों पर विराम उसी समय लग पाएगा जब आधिकारिक ट्रांसफर रिजल्ट सार्वजनिक होगा। यदि रिजल्ट में वही नाम और वही तैनातियां सामने आती हैं जिनकी चर्चा पहले से विभागीय गलियारों में हो रही है, तो ऑनलाइन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर और गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं। वहीं यदि रिजल्ट अलग आता है तो मौजूदा चर्चाओं को केवल अफवाह बताकर खारिज किया जा सकेगा। फिलहाल पूरे विभाग की निगाहें अब सिर्फ अंतिम सूची पर टिकी हैं।
यह नाम भी रिजल्ट आने से पहले ही चर्चा में





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