
आबकारी विभाग के ऑनलाइन ट्रांसफर में नया खेल!
कट ऑफ डेट की फीडिंग पर उठे गंभीर सवाल, 22 सितंबर 2022 के बाद ज्वाइन करने वाले निरीक्षकों को बाहर करने का आरोप
लखनऊ। आबकारी विभाग की ऑनलाइन ट्रांसफर प्रक्रिया अब सीधे-सीधे सवालों के घेरे में आ गई है। पहले इसे तकनीकी समस्या बताया जा रहा था, लेकिन अब साफ हो रहा है कि मामला केवल “तकनीकी त्रुटि” का नहीं बल्कि कट ऑफ डेट की फीडिंग में कथित मनमानी का है। सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर खड़ा हुआ है कि 22 सितंबर 2022 के बाद ज्वाइन करने वाले आबकारी निरीक्षकों के लिए ट्रांसफर पोर्टल पर विकल्प आखिर क्यों नहीं खुल रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार जॉइनिंग डेटा में कोई गड़बड़ी नहीं है। निरीक्षकों की सेवा पुस्तिका, नियुक्ति और ज्वाइनिंग रिकॉर्ड पूरी तरह सही बताए जा रहे हैं। इसके बावजूद पोर्टल उन्हें पात्र नहीं दिखा रहा। इससे संदेह सीधे कार्मिक अनुभाग की भूमिका पर जा रहा है, जहां कट ऑफ डेट की फीडिंग और पात्रता निर्धारण किया गया।
सबसे हैरानी की बात यह है कि विभाग की ओर से अब तक कोई स्पष्ट और लिखित जवाब नहीं दिया गया है कि आखिर 22 सितंबर 2022 के बाद ज्वाइन करने वालों के लिए विकल्प क्यों बंद हैं। यदि शासनादेश में ऐसी कोई रोक नहीं है, तो फिर पोर्टल पर यह “अदृश्य दीवार” किसने बनाई?
क्या है पूरा खेल?
विभागीय चर्चाओं के अनुसार ऑनलाइन ट्रांसफर प्रक्रिया में पात्रता तय करने के लिए एक कट ऑफ डेट सिस्टम में फीड की गई। आरोप है कि इसी स्तर पर ऐसा तकनीकी फिल्टर लगाया गया जिससे एक बड़ी संख्या स्वतः प्रक्रिया से बाहर हो गई।
इसका सीधा असर उन निरीक्षकों पर पड़ा जो हाल के वर्षों में नियुक्त होकर विभिन्न जिलों में कार्यरत हैं। कई अधिकारियों का आरोप है कि कुछ “पसंदीदा” सर्किलों और पदों को बचाने के लिए यह पूरा ढांचा तैयार किया गया, ताकि सीमित लोगों के बीच ही ट्रांसफर का खेल चलता रहे।
सवाल जो विभाग से पूछे जा रहे
- 22 सितंबर 2022 की तारीख का आधार क्या है?
- क्या इस तारीख का कोई अधिकृत शासनादेश मौजूद है?
- यदि नहीं, तो इसे पोर्टल में किसके निर्देश पर लागू किया गया?
- क्या कार्मिक अनुभाग ने जानबूझकर पात्र निरीक्षकों को बाहर किया?
- क्या ऑनलाइन ट्रांसफर प्रक्रिया को भी “मैनेज” करने की कोशिश हुई?
पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न
ऑनलाइन ट्रांसफर व्यवस्था को भ्रष्टाचार और सिफारिश खत्म करने के लिए लागू किया गया था, लेकिन अब वही व्यवस्था संदेहों में घिर गई है। निरीक्षकों के बीच चर्चा है कि यदि पात्रता ही मनमाने तरीके से तय की जाएगी तो ऑनलाइन पोर्टल केवल दिखावा बनकर रह जाएगा।
विभाग के भीतर यह मामला तेजी से गर्माता जा रहा है। कई निरीक्षक शासन स्तर पर शिकायत और कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। यदि समय रहते स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया, तो यह ट्रांसफर सत्र आबकारी विभाग के लिए बड़ा प्रशासनिक विवाद बन सकता है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन इस पूरे मामले में जांच कराता है या फिर हर साल की तरह इस बार भी सवालों के बीच ट्रांसफर प्रक्रिया पूरी कर दी जाएगी।




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